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जितेंद्र सिंह ने मुकदमेबाजी को कम करने और पेंशनभोगियों के कल्याण को मजबूत करने के लिए पेंशन नियमों की समीक्षा का आह्वान किया।

केंद्रीय कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सोमवार को पेंशन नियमों की व्यापक समीक्षा का आह्वान किया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे बदलती सामाजिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करें। उन्होंने जोर देकर कहा कि पेंशन से संबंधित कई विवाद इसलिए उत्पन्न होते हैं क्योंकि मौजूदा नियम बदलती सामाजिक जरूरतों के साथ तालमेल बिठाने में विफल रहे हैं।

नई दिल्ली में डॉ. अंबेडकर अंतर्राष्ट्रीय केंद्र में पेंशन और पेंशनभोगी कल्याण विभाग द्वारा आयोजित पेंशन मुकदमेबाजी पर दूसरी राष्ट्रीय कार्यशाला को संबोधित करते हुए मंत्री ने कहा कि सरकार का उद्देश्य समय पर नीतिगत सुधारों के माध्यम से पेंशन विवादों को रोकना होना चाहिए, न कि अदालतों तक पहुंचने के बाद उनका समाधान करना।

उन्होंने कहा कि सरकार सरल नियमों, बेहतर शिकायत निवारण तंत्र, मंत्रालयों के बीच मजबूत समन्वय और बार-बार होने वाली समस्याओं की कानूनी विवादों में बदलने से पहले ही उनकी सक्रिय पहचान के माध्यम से मुकदमेबाजी-मुक्त पेंशन व्यवस्था बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।

इस कार्यक्रम के दौरान, सिंह ने पेंशन मुकदमेबाजी संबंधी कानूनी मामलों का संकलन, पेंशन मुकदमेबाजी पर एक पर्चे और पेंशन एवं पेंशनभोगी कल्याण विभाग के विशेष अभियान 3.0 का शुभारंभ किया। इन पहलों का उद्देश्य मुकदमेबाजी प्रबंधन को मजबूत करना, सेवा वितरण में सुधार करना और अधिक नागरिक-केंद्रित पेंशन प्रशासन को बढ़ावा देना है।

मंत्री ने कहा कि पेंशन प्रशासन को बदलती सामाजिक वास्तविकताओं के अनुरूप विकसित होना चाहिए और उन्होंने हाल के सुधारों का हवाला दिया, जिनके तहत पात्रता शर्तों को सरल बनाकर अलग हुई बेटियों को भी पेंशन लाभ मिलने लगे हैं। उन्होंने कहा कि इन बदलावों से कई योग्य मामलों में लंबी कानूनी कार्यवाही की आवश्यकता समाप्त हो गई है और यह सरकार की पेंशन नीतियों को अधिक मानवीय, समावेशी और समकालीन सामाजिक आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील बनाने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

पारिवारिक पेंशन प्रावधानों में सुधारों का जिक्र करते हुए सिंह ने कहा कि पूर्व प्रशासनिक ढांचों से विरासत में मिले कई पुराने नियमों ने लाभार्थियों के लिए कठिनाइयां पैदा कर दी थीं। उन्होंने बताया कि पेंशनभोगियों और उनके परिवारों को वैध लाभ प्राप्त करने के लिए अदालतों का सहारा लेने के लिए मजबूर न होना पड़े, यह सुनिश्चित करने के लिए पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई प्रावधानों में संशोधन किया गया है।

नीति की निरंतर समीक्षा का आह्वान करते हुए मंत्री ने कहा कि बार-बार होने वाले मुकदमे अक्सर यह संकेत देते हैं कि कुछ नियमों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब देश के विभिन्न हिस्सों से समान शिकायतें सामने आती हैं, तो विभागों को प्रत्येक मामले को अलग-थलग विवाद मानकर अंतर्निहित नीति की समीक्षा करनी चाहिए। उन्होंने मंत्रालयों और विभागों से मुकदमेबाजी के रुझानों का विश्लेषण करके और हितधारकों की प्रतिक्रिया को नीति निर्माण में शामिल करके अनुसंधान-आधारित दृष्टिकोण अपनाने का आग्रह किया।

सिंह ने शिकायतों के निवारण को मात्र शिकायतों के निपटान का साधन मानने के बजाय नीति सुधार के एक उपकरण के रूप में इसकी महत्ता पर बल दिया। उन्होंने दक्षता बढ़ाने में कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लैस शिकायत निवारण प्रणालियों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि पेंशनभोगियों की चिंताओं को समझने और सेवा वितरण में सुधार के लिए उनसे व्यक्तिगत बातचीत भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने डिजिटल शासन और मानव-केंद्रित सेवा को संयोजित करने वाले संतुलित दृष्टिकोण का आह्वान किया।

मंत्री ने पेंशन नियमों को सरल बनाने, डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से जागरूकता बढ़ाने और पेंशनभोगियों को उनके अधिकारों की बेहतर समझ प्रदान करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने नीतिगत प्रावधानों के पीछे के तर्क को अधिकारियों और कानूनी अधिकारियों को समझाने के महत्व पर भी बल दिया ताकि अनावश्यक मुकदमों को कम किया जा सके।

पेंशन प्रशासन के बढ़ते महत्व पर प्रकाश डालते हुए सिंह ने कहा कि पेंशनभोगियों की संख्या अब सेवारत केंद्रीय सरकारी कर्मचारियों की संख्या से अधिक हो गई है। उन्होंने कहा कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों के पास बहुमूल्य ज्ञान, विशेषज्ञता और अनुभव है और वे विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को साकार करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं, जिससे उनका कल्याण एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय प्राथमिकता बन जाता है।

अपने संबोधन के समापन में सिंह ने कहा कि पेंशन संबंधी मुकदमों का प्रभावी प्रबंधन केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं बल्कि नागरिक-केंद्रित शासन का एक महत्वपूर्ण घटक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि निरंतर नीतिगत सुधार, सरलीकृत प्रक्रियाएं, समय पर शिकायत निवारण और सभी हितधारकों के बीच सहयोगात्मक भागीदारी से पेंशन संबंधी मुकदमों में उल्लेखनीय कमी आएगी और पेंशनभोगियों के लिए अधिक गरिमा, कल्याण और सुगम जीवन सुनिश्चित होगा।

इससे पहले, पेंशन एवं पेंशनभोगी कल्याण विभाग के संयुक्त सचिव ध्रुबज्योति सेनगुप्ता ने कहा कि विभाग का उद्देश्य नीतिगत सुधारों, डिजिटल प्रशासन और प्रभावी मुकदमेबाजी प्रबंधन के माध्यम से पेंशनभोगियों के जीवन को सुगम बनाना है। उन्होंने बताया कि मंत्रालयों, कानूनी सलाहकारों और विभागों के बीच बेहतर समन्वय के परिणामस्वरूप, विभाग की मुकदमेबाजी सूचना प्रबंधन प्रणाली (एलआईएमएस) पर मुकदमों की संख्या में पिछले एक वर्ष में लगभग 20 प्रतिशत की कमी आई है।

उन्होंने विभाग की डिजिटल गवर्नेंस पहलों पर भी प्रकाश डाला और बताया कि 1.92 करोड़ डिजिटल जीवन प्रमाण पत्र (डीएलसी) जारी किए जा चुके हैं, जबकि सीपीएनजीआरएएमएस पोर्टल पर पेंशन संबंधी शिकायतों के निपटान का औसत समय घटकर 20 दिन से भी कम हो गया है। विभाग “एक पेंशनभोगी, एक पोर्टल” के अपने विजन की दिशा में काम कर रहा है और इस प्रक्रिया के तहत नवनिर्मित सिंगल साइन-ऑन, ई-हस्ताक्षरित पेंशन आवेदन प्रणाली के माध्यम से 60,000 से अधिक पेंशन आवेदनों पर कार्रवाई की जा चुकी है।

इस कार्यशाला में पेंशन एवं पेंशनभोगी कल्याण विभाग की सचिव निवेदिता शुक्ला वर्मा, पूर्व सैनिक कल्याण विभाग की सचिव सुकृति लिखी, विधि मामलों के विभाग के सचिव डॉ. राजीव मणि और भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरामानी ने भाग लिया। कार्यक्रम में न्यायाधिकरणों और न्यायालयों में पेंशन संबंधी मुकदमेबाजी, मुकदमेबाजी प्रबंधन, कानूनी मामलों के मानकीकरण और पेंशन संबंधी अनावश्यक विवादों को कम करने के उद्देश्य से नीतिगत उपायों पर तकनीकी सत्र भी आयोजित किए गए।