Tuesday, November 3, 2026
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अध्ययन में पाया गया है कि रेगिस्तानी बैक्टीरिया हिमालय तक यात्रा कर रहे हैं, जिससे स्वास्थ्य जोखिम पैदा हो रहे हैं

एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया है कि पश्चिमी भारत से रेगिस्तानी धूल के गुबार में मौजूद वायुजनित रोगजनक सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करके पूर्वी हिमालय तक पहुँच रहे हैं, जिससे उच्च ऊंचाई वाले क्षेत्रों में श्वसन, त्वचा और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल बीमारियों में संभावित रूप से योगदान हो रहा है

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अधीन एक स्वायत्त संस्था, बोस संस्थान के शोधकर्ताओं ने पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्रों से उठने वाले धूल भरी आंधियों का दो वर्षों से अधिक समय तक अध्ययन किया। अध्ययन में पाया गया कि ये आंधियां घनी आबादी वाले इंडो-गंगा के मैदान से होकर गुजरती हैं और हिमालय की पहाड़ियों पर आकर ठहर जाती हैं, साथ ही अपने साथ कई जीवाणु भी लाती हैं, जिनमें रोग फैलाने वाले रोगाणु भी शामिल हैं।

हालांकि हिमालय की पहाड़ियों के वातावरण को अक्सर स्वास्थ्य के लिए अनुकूल माना जाता है, शोधकर्ताओं ने पाया कि ठंडी जलवायु और कम ऑक्सीजन स्तर के कारण वहां की आबादी में पहले से ही संवेदनशीलता का स्तर अधिक है। हालांकि, उच्च ऊंचाई वाले हिमालयी समुदायों में वायुजनित सूक्ष्मजीवों और श्वसन संबंधी बीमारियों के बीच संबंध स्थापित करने वाले सीमित प्रमाण ही मौजूद हैं, जिसके कारण यह नया शोध शुरू किया गया है।

अध्ययन में पाया गया कि धूल का दूर तक परिवहन ही एकमात्र चिंता का विषय नहीं है। हिमालय की तलहटी से आने वाले स्थानीय रोगाणु भी ऊर्ध्वाधर उत्थान के माध्यम से वायुमंडल में प्रवेश करते हैं, जहां वे रेगिस्तान से आने वाले सूक्ष्मजीवों के साथ मिल जाते हैं। ये सभी वायुजनित जीवाणु समुदाय मिलकर श्वसन, त्वचा और पाचन संबंधी संक्रमणों में योगदान करते हैं।

इस शोध को अपनी तरह का पहला प्रयास बताया गया है और इसके निष्कर्ष साइंस ऑफ द टोटल एनवायरनमेंट नामक पत्रिका में प्रकाशित हुए हैं। अध्ययन के अनुसार, धूल के क्षैतिज परिवहन और प्रदूषित हवा के ऊर्ध्वाधर उत्थान के संयुक्त प्रभाव से हिमालयी वायुमंडल में सूक्ष्मजीवों की संरचना में बदलाव आ रहा है, जिसका सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है।