बंदरगाह, शिपिंग और ऊर्जा संक्रमण: भारत बन रहा है हरित समुद्री शक्ति
भारत अपने बंदरगाहों और शिपिंग सेक्टर को हरित, टिकाऊ और भविष्य के अनुरूप बनाने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। सोमवार को जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, देश का समुद्री क्षेत्र अब केवल विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे जलवायु प्रतिबद्धताओं, ऊर्जा संक्रमण लक्ष्यों और अंतरराष्ट्रीय समुद्री मानकों के साथ मजबूती से जोड़ा जा रहा है।
भारत का लगभग 95 प्रतिशत विदेशी व्यापार बंदरगाहों के माध्यम से होता है। बीते एक दशक में इस क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2024-25 में प्रमुख बंदरगाहों ने 855 मिलियन टन कार्गो का संचालन किया, जो 2014-15 में 581 मिलियन टन था—यानी करीब 47 प्रतिशत की वृद्धि। यह विस्तार ‘आत्मनिर्भर भारत’ की परिकल्पना को मजबूती देता है, लेकिन इसके साथ संसाधनों के संतुलित उपयोग और तटीय पारिस्थितिकी की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी हो गई है।
नीति और कानून से मिला मजबूत आधार
इन चुनौतियों को देखते हुए भारत की समुद्री रणनीति को राष्ट्रीय जलवायु लक्ष्यों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अनुरूप ढाला गया है। पुराने भारतीय बंदरगाह अधिनियम, 1908 को हटाकर भारतीय बंदरगाह अधिनियम, 2025 लागू किया गया है, जो स्वच्छ, हरित और टिकाऊ बंदरगाह संचालन को संस्थागत रूप देता है। यह कानून प्रदूषण नियंत्रण, आपदा प्रबंधन और MARPOL व बैलास्ट वाटर मैनेजमेंट कन्वेंशन जैसे वैश्विक मानकों के अनुपालन को अनिवार्य बनाता है।
इसके साथ ही, मैरीटाइम इंडिया विजन (MIV) 2030 समुद्री क्षेत्र के हरित परिवर्तन का रोडमैप प्रदान करता है। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा, उत्सर्जन में कमी, जल प्रबंधन, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन, सुरक्षा और डिजिटल निगरानी जैसी 150 से अधिक पहलों को शामिल किया गया है। दीर्घकालिक दृष्टि के तहत मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047 तैयार किया गया है, जिसमें बंदरगाहों, जहाजरानी, अंतर्देशीय जलमार्गों और जहाज निर्माण में करीब 80 लाख करोड़ रुपये के निवेश का अनुमान है।
हरित सागर ग्रीन पोर्ट्स दिशानिर्देश
2030 और 2070 के जलवायु लक्ष्यों को हासिल करने के लिए 2023 में हरित सागर ग्रीन पोर्ट्स दिशानिर्देश जारी किए गए। इनके तहत बंदरगाहों को 2030 तक प्रति टन कार्गो उत्सर्जन में 30 प्रतिशत और 2047 तक 70 प्रतिशत कटौती करनी होगी।
नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग 2030 तक 60 प्रतिशत और 2047 तक 90 प्रतिशत से अधिक करने, उपकरणों और वाहनों का बड़े पैमाने पर विद्युतीकरण करने और हरित आवरण बढ़ाने के लक्ष्य तय किए गए हैं। न्यू मैंगलोर पोर्ट द्वारा 100 प्रतिशत सौर ऊर्जा अपनाना इस दिशा में एक राष्ट्रीय मिसाल बन चुका है।
नवीकरणीय ऊर्जा और स्वच्छ संचालन
देश के कई प्रमुख बंदरगाह सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं के जरिए अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर रहे हैं। कंडला, विशाखापत्तनम, तूतीकोरिन, कोचीन, चेन्नई, पारादीप और जेएनपीए जैसे बंदरगाहों पर मेगावाट स्तर की सौर परियोजनाएं संचालित या निर्माणाधीन हैं। मोरमुगाओ बंदरगाह पर्यावरण जहाज सूचकांक के आधार पर हरित जहाजों को प्रोत्साहन देने वाला भारत का पहला बंदरगाह बन चुका है।
उत्सर्जन, जल और अपशिष्ट प्रबंधन में सुधार
उत्सर्जन घटाने के लिए बंदरगाह उपकरणों का विद्युतीकरण, एलएनजी जैसे स्वच्छ ईंधनों का उपयोग और तट से जहाज तक बिजली आपूर्ति की व्यवस्था की जा रही है। जल संरक्षण के लिए वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण और तेल रिसाव निगरानी को बढ़ावा दिया जा रहा है। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और टिकाऊ ड्रेजिंग प्रथाओं के जरिए पर्यावरणीय प्रभाव को कम किया जा रहा है।
सुरक्षा, स्वास्थ्य और डिजिटल निगरानी
सभी बंदरगाहों पर शून्य-दुर्घटना सुरक्षा कार्यक्रम लागू किए जा रहे हैं। नाविकों और श्रमिकों के स्वास्थ्य के लिए अस्पतालों और सुपर-स्पेशियलिटी चिकित्सा सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है। इसके साथ ही, स्वास्थ्य, सुरक्षा और पर्यावरण संकेतकों की रियल-टाइम निगरानी के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल डैशबोर्ड विकसित किया जा रहा है।
बड़े निवेश और वैश्विक साझेदारी
सागरमाला कार्यक्रम, वधावन ग्रीनफील्ड पोर्ट, ग्रीन टग ट्रांजिशन प्रोग्राम और राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन जैसी पहलें इस परिवर्तन को गति दे रही हैं। भारत डेनमार्क, नॉर्वे, सिंगापुर, नीदरलैंड सहित कई देशों के साथ हरित समुद्री साझेदारियों को भी मजबूत कर रहा है।
व्यापक नीतिगत सुधारों, बड़े निवेश, नई तकनीकों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए भारत स्वयं को एक अग्रणी हरित समुद्री शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। 2047 की ओर बढ़ते हुए, देश का समुद्री क्षेत्र आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और वैश्विक जलवायु प्रतिबद्धताओं को संतुलित करने का प्रयास कर रहा है।

