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जमीन के नीचे बड़ी हलचल की चेतावनी

हाल की रिसर्च में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है—इंडियन प्लेट दो हिस्सों में बंट रही है। यह भौगोलिक घटना इतनी बड़ी है कि भविष्य में पूरे क्षेत्र का भू-आकृतिक स्वरूप बदल सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि प्लेट का एक हिस्सा धीरे-धीरे टूटकर पृथ्वी के मेंटल की ओर धंस रहा है, जिससे भूकंप के खतरे में बढ़ोतरी हो सकती है और प्लेट टेक्टोनिक्स को लेकर हमारी समझ में भी महत्वपूर्ण बदलाव आ सकता है। लगभग 60 मिलियन सालों से इंडियन प्लेट यूरेशियन प्लेट से टकरा रही है, और इसी टक्कर की वजह से हिमालय पर्वत का निर्माण हुआ। लेकिन नई स्टडी में पता चला है कि इस विशाल प्लेट का निचला, भारी हिस्सा अलग हो रहा है और धरती के भीतर गहराई में खिसक रहा है।

यह खोज तब सामने आई जब वैज्ञानिकों ने तिब्बत के झरनों से निकलने वाली सीस्मिक वेव्स और हीलियम गैस की संरचना का अध्ययन किया। इन डेटा ने प्लेट के भीतर एक सीधी दरार का संकेत दिया, जिसके बारे में पहले कोई जानकारी नहीं थी। इंडियन प्लेट के दो हिस्सों में विभाजित होने की यह प्रक्रिया पूरे हिमालयी क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों में सीस्मिक गतिविधि को प्रभावित कर सकती है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक साइमन क्लेम्परर के अनुसार, जहां टेक्टोनिक प्लेट्स आपस में टकराती हैं, वहां दरारें आना असामान्य नहीं है, लेकिन यह स्थिति भूकंप से जुड़े जोखिम में वृद्धि का संकेत जरूर दे सकती है। तिब्बती पठार पहले से ही कई भूकंपों का केंद्र रहा है, और यह नई जानकारी इस क्षेत्र को और अधिक संवेदनशील दर्शाती है।

मोनाश यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक फैबियो कैपिटानियो का मानना है कि अभी यह सिर्फ एक शुरुआती झलक है और हमारे पास पूरी तस्वीर मौजूद नहीं है। उनके अनुसार, इंडियन प्लेट के टूटने के व्यापक और लंबे समय के प्रभावों को समझने के लिए और शोध की आवश्यकता है। वर्तमान डेटा एक बड़ी भूवैज्ञानिक घटना की ओर इशारा करता है, लेकिन इसकी वजह से जमीन की स्थिरता पर होने वाले प्रभावों को समझने में अभी समय लगेगा।

इंडियन प्लेट पृथ्वी की टेक्टोनिक प्रणाली का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके टूटने की यह खोज न सिर्फ एशिया की भूगोल समझने में बदलाव लाएगी, बल्कि दुनिया भर में जियोलॉजिकल रिसर्च को भी नई दिशा देगी। वैज्ञानिक अब यह जानने की कोशिश करेंगे कि अन्य महाद्वीपों में भी क्या ऐसी ही टूटने की प्रक्रिया कहीं और चल रही है। यदि यह मैकेनिज्म सही साबित होता है, तो यह बताने में मदद मिल सकती है कि पर्वत किस तरह बनते हैं, टेक्टोनिक जोन कैसे विकसित होते हैं और पृथ्वी का सतही भू-विज्ञान किस प्रकार कार्य करता है। इसके साथ ही यह हिमालय के निर्माण और वैश्विक पर्वत प्रणालियों को समझने में भी नई रोशनी डाल सकता है।