मंदिर श्रृंखला : सरस्वती नदी
वैदिक काल में सरस्वती को परम पवित्र नदी माना जाता था। इसी नदी के पानी का सेवन करते हुए ऋषियों ने वेद रचे और वैदिक ज्ञान का विस्तार किया। लेकिन आज ये नदी सूख गई है।
भारत में नदियों का इतिहास काफी पुराना है। देश की नदियां आर्थिक और संस्कृति के इतिहास में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। भारत में आज लगभग 200 नदियां हैं। इनमें से गंगा ,यमुना, गोदावरी, सिंधु, गोमती, नर्मदा, कावेरी नदी ।
वैदिक काल में सरस्वती को परम पवित्र नदी माना जाता था। इसका जिक्र ऋग्वेद में भी मिलता है। इसी नदी के पानी का सेवन करते हुए ऋषियों ने वेद रचे और वैदिक ज्ञान का विस्तार किया। इस नदी को आज तक किसी ने बहते हुए नहीं देखा। इसके पीछे भी एक बड़ी वजह है। कहते हैं कि यह नदी हिमाचल में सिरमौर राज्य के पर्वतीय भाग से निकलकर अंबाला और कुरुक्षेत्र,कैथल से होकर पटियाला से बहकर सिरसा की दृषद्वती नदी में मिल गई थी। पौराणिक कथाओं में तो आज भी इस नदी का बहुत महत्व है लेकिन अब यह नदी धरती से विलुप्त हो गई है। हालांकि, हजारों साल पहले ये नदी बहती थी, लेकिन श्राप के कारण यह सूख गई और अब धरती पर इसका सिर्फ नाम ही बचा है।
भूमी के अंदर से बहती है
सरस्वती नदी का वर्णन रामायण और महाभारत में भी आपको पढ़ने को मिलेगा। इसके बारे में एक और कहानी काफी प्रचलित है। कहा जाता है कि प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है। यहां सरस्वती नदी धरती के अंदर से बहती है। और प्रयाग के संगम में दिखाई देती है।
वैदिक सभ्यता में सरस्वती को ही सबसे बड़ी और मुख्य नदी माना गया था। इसरो द्वारा किए गए शोध से पता चला है कि आज भी यह नदी हरियाणा, पंजाब और राजस्थान से होती हुई धरती के नीचे से बहती है। यह नदी इतनी विशाल थी कि पहाड़ों को तोड़ती हुई निकलती थी और मैदानों से होती हुई अरब सागर में जाकर विलीन हो जाती थी। इसका वर्णन ऋग्वेद में बार-बार आता है। ऋग्वेद वैदिक काल में इसमें हमेशा भरपूर पानी रहता था। जिस तरह आज गंगा को पूजा जाता है, उस समय लोग सरस्वती को मां का दर्जा दिया करते थे। उत्तर वैदिक काल और महाभारत काल में यह नदी काफी हद तक कुछ सूख चुकी थी।
वैज्ञानिक खोजों से पता चला है, कि काफी साल पहले भीषण भूकंप आया था। जिसके कारण जमीन के नीचे के पहाड़ तो ऊपर उठ गए, लेकिन सरस्वती नदी का पानी पीछे की तरफ चला गया। जिसके बाद सरस्वती नदी यमुना में जाकर मिल गई और इसके साथ ही बहने लगी। यमुना से होते हुए ही सरस्वती नदी का पानी संगम में त्रिवेणी बनाती है। प्रयाग में तीन नदियों का संगम माना गया, जबकि असल में देखा जाए, तो वहां तीन नदियों का संगम नहीं है। वहां केवल दो नदियां हैं। सरस्वती कभी भी प्रयागराज तक नहीं पहुंची।

