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नागपुर में RSS का मुख्यालय, पर कांग्रेस का रहा गढ़, 2014 में नितिन गडकरी के भेदे किले को कायम रख पाएगी BJP?

नागपुर लोकसभा सीट ऐसा है जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का मुख्यालय है। 1925 में यह मुख्यालय बना था लेकिन तब से लेकर 2014 तक यहां कांग्रेस का दबदबा रहा। पहली बार 1996 में बीजेपी जीती थी लेकिन 1996 में वह हट गए। अभी यह नितिन गडकरी का गढ़ है।
नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय के अलावा महाराष्ट्र का नागपुर संतरों के लिए देश-विदेश में अलग ही पहचान रखता है। अब इसे गडकरी का गढ़ भी माना जाने लगा है। पिछले 10 साल में गडकरी ने गली-मोहल्ले छान मारे और शायद ही ऐसा कोई इलाका बचा हो, जहां उन्होंने काम न किया हो। हालांकि, इस बार गडकरी को चुनौती देने वाले विकास ठाकरे को बिना मांगे ही प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुचन विकास आघाडी ने समर्थन दे दिया है और एमआईएम ने भी उम्मीदवार नहीं उतारा है। गडकरी के लिए यह व्यूह रचना ठीक नहीं मानी जा रही है। सवाल पूछे जा रहे हैं कि कांग्रेस उम्मीदवार ठाकरे को वंचित के समर्थन देने के पीछे कौन सी शक्तियां खड़ी हैं? एमआईएम के उम्मीदवार न उतारने का कारण क्या है, जबकि बीजेपी के विरोधी आरोप लगाते हैं कि आंबेडकर और एमआईएम बीजेपी की ‘बी’ टीम है। ऐसे में, नागपुर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में यह चर्चा जोरों पर है कि क्या गडकरी को घेरने के लिए यह चक्रव्यूह रचा गया है?

वंचित ने दिया कांग्रेस को समर्थन
आंबेडकर की वंचित ने यहां से उम्मीदवार नहीं उतारा और ओवैसी की पार्टी एमआईएम ने भी उम्मीदवार नहीं दिया है, जबकि कांग्रेस ने आंबेडकर से समर्थन नहीं मांगा था। महाराष्ट्र की राजनीति को करीब से जानने वाले कहते हैं कि किसके कहने पर वंचित ने कांग्रेस उम्मीदवार को समर्थन दिया है। एमएमआई के उम्मीदवार नहीं उतारने का कारण क्या है, इस पर शक दिल्ली की ओर जाता है। यह बात गडकरी को कचोट रही है, तो कांग्रेस खेमा उत्साहित है।

मायावती की रैली के मायने
बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने भी 11 अप्रैल को नागपुर में एक चुनावी सभा को संबोधित किया। कहने को तो मायावती ने बाबासाहेब आंबेडकर की दीक्षा भूमि से लोकसभा चुनाव प्रचार की शुरूआत की है, जबकि बसपा का नागपुर में कोई उम्मीदवार नहीं है। देशभर में हुए हाल के कुछ चुनावों में देखा गया है कि बीजेपी के पक्ष में थोक के भाव दलित वोट पड़े हैं। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी दलितों के एक बहुत बड़े वर्ग का झुकाव बीजेपी की तरफ देखा गया। नागपुर में 15 से 20 फीसदी दलित वोटर हैं, जिनमें हिंदू और बौद्ध दोनों हैं। कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जहां दलित बौद्धों का अच्छा-खासा प्रभाव है। ऐसे में, सवाल यह उठ रहा है कि क्या दलित वोट कांग्रेस, प्रकाश आंबेडकर की वंचित और मायावती की बीएसपी के बीच बंट जाएंगे?