प्रेरक प्रसंग :- स्वाभिमान
आंमेर के राजा जयसिंह की छोटी रानी कोटा की राजकुमारी थी | उसकी यह विशेषता थी कि उसे सादगीपूर्ण रहन-सहन प्रिय था, जबकि जयसिंह उसे साज-सज्जा तथा आभूषणों से लदी देखना पसंद करता था |
एक दिन जयसिंह ने बातचीत के दौरान छोटी रानी से कहा,”तुम्हारे वस्त्रों और आभूषणों से तो नगर की साधारण स्त्रियाँ भी अच्छे वस्त्रादि पहनती हैं | तुम तो उनसे भी हीन मालूम पड़ती हो |” किन्तु रानी मौन ही रही | उसने उसे अनसुना कर दिया | इससे राजा को गुस्सा आ गया और उसने एक काँच का टुकड़ा उठाकर रानी के वस्त्र फाड़ने के लिए हाथ बढ़ाया | यह देख रानी का स्वाभिमान जाग उठा | उसने फ़ौरन राजा के म्यान की तलवार निकालकर आवेशपूर्ण शब्दों से कहा,”स्वामी, मैंने जिस वंश में जन्म लिया है, वह इस प्रकार के उपहास को कदापि सहन नहीं कर सकता | यदि आपने पुनः कभी मेरा अपमान करने की चेस्टा की, तो उसका परिणाम अच्छा न होगा | आपको मालूम हो जायेगा कि आंमेर के राजकुमार काँच का टुकड़ा चलने में उतने प्रवीण नहीं होते जितनी प्रवीण कोटा की राजकुमारियाँ तलवार चलने में होती हैं,|” राजा जयसिंह की भयभीत मुद्रा देखकर वह आगे बोली,”कोटावंश की किसी कन्या का भविष्य में कभी भी अपमान न हो इसीलिए मुझे ऐसा मजबूरन करना पड़ा है |”
जयसिंह भयभीत तो हो ही चुका था| उसने रानी से क्षमा माँगी और प्रतिज्ञा की कि वह भविष्य में उसका अपमान न करेगा और उसने इस वचन को भलीभाँति निभाया |

