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ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की नई प्रयोगशाला बनेगा भारत, हरित हाइड्रोजन से कार्बन कैप्चर तक तकनीक विकसित करेंगे आईआईटी और उद्योग

गुवाहाटी, 03 नवंबर। स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच भारत अपने पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और ऊर्जा उद्योग को अत्याधुनिक अनुसंधान से जोड़ने की दिशा में बड़ी पहल कर रहा है। इसी क्रम में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के उच्च प्रौद्योगिकी केंद्र (सीएचटी) के साथ महत्वपूर्ण समझौता किया है।

दरअसल, इसका उद्देश्य हरित हाइड्रोजन, ऊर्जा भंडारण, कार्बन कैप्चर, पेट्रोकेमिकल्स, महत्वपूर्ण खनिजों और स्वच्छ ईंधन के क्षेत्र में देश की अपनी तकनीकी क्षमता विकसित करना है। इस साझेदारी के माध्यम से उद्योग की वास्तविक चुनौतियों पर पीएचडी शोध से लेकर प्रायोजित अनुसंधान, उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना, परीक्षण सुविधाओं के विकास और नई तकनीकों के व्यावसायीकरण तक का व्यापक तंत्र तैयार किया जाएगा।

खास बात यह है कि संयुक्त अनुसंधान के लिए चयनित पीएचडी शोधार्थियों को प्रचलित सीएसआईआर, यूजीसी-नेट और संस्थागत दरों से 25 प्रतिशत अधिक फैलोशिप मिलेगी। यह पहल ऐसे वक्त में हुई है, जब भारत के सामने एक ओर ऊर्जा की बढ़ती मांग पूरी करने की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर स्वच्छ ईंधन, कार्बन उत्सर्जन में कमी और नेट जीरो के लक्ष्य की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने की आवश्यकता है।

इस साझेदारी के जरिये देश के उच्च शिक्षण संस्थान और ऊर्जा उद्योग के विशेषज्ञ एक साथ अनुसंधान करेंगे। इससे प्रयोगशालाओं में विकसित होने वाली तकनीकों को औद्योगिक जरूरतों के अनुरूप तैयार करने और उनके व्यावहारिक उपयोग का रास्ता खुलेगा।

चार साल तक मिलेगी विशेष फैलोशिप

इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सीएचटी-आईआईटीजी अनुसंधान फैलोशिप कार्यक्रम है। इसके अंतर्गत प्रतिवर्ष अधिकतम तीन पीएचडी शोधार्थियों का चयन किया जाएगा। एक समय में इस कार्यक्रम के तहत अधिकतम दस शोधार्थियों को फैलोशिप प्रदान की जा सकेगी। इस व्यवस्था की खासियत यह होगी कि शोधार्थियों को अकादमिक और औद्योगिक, दोनों क्षेत्रों के विशेषज्ञों का मार्गदर्शन मिलेगा। प्रत्येक शोधार्थी के लिए आईआईटी गुवाहाटी का एक संकाय सदस्य पर्यवेक्षक होगा, जबकि सीएचटी या उसके द्वारा नामित उद्योग भागीदार का विशेषज्ञ सह-पर्यवेक्षक अथवा मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगा। साथ ही चार साल तक विशेष फैलोशिप मिलेगी।

हरित हाइड्रोजन से कार्बन कैप्चर तक 20 से अधिक क्षेत्रों में शोध

आईआईटी गुवाहाटी और सीएचटी ने अनुसंधान के लिए व्यापक क्षेत्र निर्धारित किए हैं। इनमें भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था से जुड़े कई ऐसे विषय शामिल हैं, जिन पर दुनिया के प्रमुख देश तेजी से काम कर रहे हैं। हरित हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए इलेक्ट्रोलाइजर और ईंधन सेल तकनीक विकसित करना इस साझेदारी का प्रमुख लक्ष्य होगा। इसके साथ ऊर्जा भंडारण प्रणालियों पर अनुसंधान किया जाएगा, ताकि नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन और उपयोग के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सके।

कार्बन कैप्चर, उपयोग एवं भंडारण (सीसीयूएस) भी प्रमुख अनुसंधान क्षेत्रों में शामिल है। इसके माध्यम से औद्योगिक प्रक्रियाओं से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को पकड़ने, उसका उपयोग करने और सुरक्षित भंडारण की तकनीक विकसित करने पर काम होगा। कार्बन डाइऑक्साइड से उपयोगी रसायन तैयार करने की संभावनाओं पर भी अनुसंधान किया जाएगा। पेट्रोलियम उद्योग के लिए कच्चे तेल से सीधे रसायन तैयार करने, पॉलिमर, पेट्रोकेमिकल्स, उत्प्रेरक और विभिन्न रासायनिक योजकों के विकास को भी प्राथमिकता दी जाएगी।

इसके अलावा संक्षारण इंजीनियरिंग, कोयला और बायोमास गैसीकरण, प्रक्रिया डिजाइन और प्रक्रिया की दक्षता बढ़ाने पर काम होगा। जल संरक्षण, अपशिष्ट जल उपचार, औद्योगिक कचरे का मूल्यवर्धन, वैकल्पिक ईंधन और नैनो प्रौद्योगिकी भी शोध के दायरे में होंगे। ऊर्जा क्षेत्र में डिजिटल तकनीक के बढ़ते उपयोग को देखते हुए डिजिटलीकरण और साइबर सुरक्षा पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा।

इन विषयों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि भारत को ऊर्जा उत्पादन और औद्योगिक विकास के साथ पर्यावरणीय संतुलन भी बनाए रखना है। ऐसे में नई तकनीकों के विकास से आयात पर निर्भरता घटाने, संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और औद्योगिक प्रक्रियाओं को अधिक सक्षम बनाने में सहायता मिल सकती है।

बनेगा संयुक्त ऊर्जा थिंक टैंक

समझौते के तहत आईआईटी गुवाहाटी में संयुक्त रूप से उत्कृष्टता केंद्र (सेंटर ऑफ एक्सीलेंस) स्थापित करने की भी योजना है। इन केंद्रों के माध्यम से अनुसंधान, विकास और नवाचार का मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र तैयार किया जाएगा। इस समझौते की एक महत्वपूर्ण पहल संयुक्त ऊर्जा थिंक टैंक की स्थापना है। इसका उद्देश्य पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय को ऊर्जा क्षेत्र की नीतियों के निर्माण में तकनीकी और शोध आधारित सहयोग देना है।

इसके अलावा आईआईटी गुवाहाटी में रिफाइनरी और ऊर्जा उद्योग से संबंधित परीक्षण सुविधाएं संयुक्त रूप से स्थापित की जाएंगी। इससे नई तकनीकों और औद्योगिक प्रक्रियाओं का परीक्षण करने के लिए संस्थान में बेहतर आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध होंगी।

रिफाइनरी विशेषज्ञों से मिलेगा प्रशिक्षण

साझेदारी के तहत सीएचटी और भारतीय रिफाइनरियों के सहयोग से नियमित रूप से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इन कार्यक्रमों में पेट्रोलियम शोधन और पेट्रोकेमिकल्स तकनीक, संक्षारण एवं परिसंपत्ति अखंडता, हरित हाइड्रोजन, कार्बन कैप्चर, अग्नि एवं प्रक्रिया सुरक्षा, उन्नत प्रक्रिया नियंत्रण, जैव ईंधन और ऊर्जा संक्रमण जैसे विषय शामिल होंगे। इसके अतिरिक्त तेल एवं गैस, जैव ईंधन और हरित ऊर्जा तकनीकों के क्षेत्र में आईआईटी गुवाहाटी के संकाय सदस्यों और उद्योग विशेषज्ञों के लिए अल्पकालिक संकाय अवकाश तथा कॉरपोरेट सहायक फैलोशिप की व्यवस्था भी की जाएगी।

आईआईटी गुवाहाटी के निदेशक प्रोफेसर देवेंद्र जलिहाल ने मंगलवार को बताया कि उच्च प्रौद्योगिकी केंद्र के साथ यह साझेदारी डॉक्टरेट शोधार्थियों को सीधे तेल एवं गैस तथा ऊर्जा उद्योग से जोड़ती है। संयुक्त पर्यवेक्षण में होने वाले पीएचडी शोध, प्रायोजित परियोजनाओं और प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से उद्योग की वास्तविक चुनौतियों का समाधान विकसित करने में मदद मिलेगी। साथ ही भारत के ऊर्जा परिवर्तन के लिए आवश्यक कुशल कार्यबल तैयार करने का मार्ग भी प्रशस्त होगा।

गोवा में हुआ समझौता, मंत्रालय और संस्थान के वरिष्ठ अधिकारी रहे उपस्थित

इस समझौता ज्ञापन पर गोवा स्थित ओएनजीसी के एडवांस्ड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में हस्ताक्षर किए गए। आईआईटी गुवाहाटी की ओर से प्रशासन के डीन प्रोफेसर सुकुमार नंदी और पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के उच्च प्रौद्योगिकी केंद्र के कार्यकारी निदेशक शंकर गुनासेकरन ने समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के सचिव डॉ. नीरज मित्तल, संयुक्त सचिव (गैस) आलोक त्रिपाठी और आईआईटी गुवाहाटी के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के डॉ. सुमित कुमार भी उपस्थित रहे।

गौरतलब है कि भारत के ऊर्जा क्षेत्र में स्वच्छ ईंधन, पेट्रोकेमिकल एकीकरण और नेट जीरो लक्ष्यों की ओर बढ़ते कदमों के बीच यह साझेदारी शैक्षणिक अनुसंधान को औद्योगिक जरूरतों से जोड़ने का महत्वपूर्ण प्रयास है। इससे देश में ऊर्जा तकनीकों के विकास, विशेषज्ञ मानव संसाधन तैयार करने और स्वदेशी नवाचारों को उद्योग तक पहुंचाने के लिए एक साझा मंच विकसित हो सकेगा।