अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस : बढ़ती उम्र के साथ सम्मान, सुरक्षा और गरिमा की नई चुनौती
“बुढ़ापा जीवन का अवसान नहीं, बल्कि अनुभवों का शिखर है।” उम्र का बढ़ना जीवन की स्वाभाविक और अपरिहार्य प्रक्रिया है, लेकिन बदलती जीवन शैली, तेजी से बढ़ती तकनीक, एकल परिवारों की प्रवृत्ति और भागदौड़ भरी जिंदगी ने वृद्धावस्था से जुड़ी सामाजिक चुनौतियों को नया स्वरूप दिया है। ऐसे समय में 1 अक्टूबर का अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस हमें ठहरकर यह सोचने का अवसर देता है कि क्या हम अपने बुजुर्गों को केवल देखभाल और सहानुभूति के पात्र के रूप में देख रहे हैं, या उन्हें समाज की मुख्यधारा में सक्रिय, सम्मानित और अधिकार-संपन्न भागीदार का स्थान दे रहे हैं। वृद्धजन केवल उम्र के एक पड़ाव पर पहुंचे लोग नहीं, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के निर्माण के लंबे अनुभव के वाहक हैं। उनके जीवन अनुभव, ज्ञान, परंपराओं और सामाजिक स्मृतियों में ऐसी पूंजी निहित है, जिसका लाभ नई पीढ़ी को मिल सकता है। इसलिए वृद्धावस्था को निर्भरता और निष्क्रियता से जोड़कर देखना उचित नहीं है। समावेशिता का वास्तविक अर्थ उन्हें केवल सुरक्षा देना नहीं, बल्कि उनके सम्मान, स्वतंत्रता, निर्णय लेने के अधिकार और सामाजिक सहभागिता को सुनिश्चित करना है। दुनिया आज तेजी से वृद्ध होती आबादी के दौर से गुजर रही है। जीवन प्रत्याशा बढ़ने और जन्मदर में कमी के कारण वृद्धजनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसका प्रभाव स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, परिवार, रोजगार और अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। ऐसे में स्वस्थ, सुरक्षित, सक्रिय और गरिमापूर्ण वृद्धावस्था सुनिश्चित करना केवल परिवार की नहीं, बल्कि पूरे समाज और शासन व्यवस्था की साझा जिम्मेदारी है।
बदलती दुनिया और बढ़ती वृद्ध आबादी
वृद्ध आबादी का बढ़ना केवल चिकित्सा क्षेत्र की उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक और जनसांख्यिकीय परिवर्तन का परिणाम भी है। मृत्यु दर में कमी, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, जीवन प्रत्याशा में वृद्धि और प्रजनन दर में गिरावट ने दुनिया की आयु संरचना को बदल दिया है। पहले जहां बड़ी आबादी कम उम्र में ही जीवन की चुनौतियों से जूझती थी, वहीं आज अधिक लोग लंबा जीवन जी रहे हैं। भारत भी इस बदलाव से अछूता नहीं है। India Ageing Report 2023, जिसे UNFPA और International Institute for Population Sciences ने तैयार किया, के अनुसार 2022 में भारत में 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की संख्या लगभग 15.3 करोड़ थी। इसके 2050 तक बढ़कर लगभग 34.7 करोड़ होने का अनुमान है। यानी आने वाले दशकों में भारत की सामाजिक संरचना में वृद्धजनों की भूमिका कहीं अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है। रिपोर्ट के अनुसार 2050 तक भारत की आबादी में 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की हिस्सेदारी लगभग 20-21 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह परिवर्तन केवल संख्या बढ़ने का मामला नहीं है। इसके साथ स्वास्थ्य सुविधाओं, पेंशन, दीर्घकालिक देखभाल, आवास, परिवहन, सामाजिक सुरक्षा और परिवार की जिम्मेदारियों का स्वरूप भी बदलेगा।
भारत में वृद्धावस्था की बदलती तस्वीर
भारत की वृद्ध आबादी एक समान नहीं है। अलग-अलग राज्यों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन की गति अलग है। दक्षिणी और कुछ उत्तरी राज्यों में वृद्ध आबादी का अनुपात राष्ट्रीय औसत से अधिक है, जबकि अपेक्षाकृत अधिक प्रजनन दर वाले राज्यों में अभी वृद्ध आबादी का अनुपात कम है, लेकिन वहां भी आने वाले वर्षों में इसमें वृद्धि होगी। भारत की वृद्धावस्था की एक महत्वपूर्ण विशेषता इसका ग्रामीण स्वरूप भी है। बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिक ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं, जहां स्वास्थ्य सेवाओं, परिवहन, सामाजिक सुरक्षा और नियमित आय के अवसर अपेक्षाकृत सीमित हो सकते हैं। ऐसे में वृद्धावस्था को केवल महानगरों और शहरी परिवारों के संदर्भ में समझना पर्याप्त नहीं होगा। दूसरी महत्वपूर्ण बात वृद्धावस्था का महिलाकरण है। महिलाओं की औसत जीवन प्रत्याशा अधिक होने के कारण वृद्ध आबादी में महिलाओं का अनुपात बढ़ता है। वृद्ध महिलाओं में विधवापन, अकेलेपन, आय के अभाव और संपत्ति पर सीमित नियंत्रण जैसी समस्याएं कई बार एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं। India Ageing Report 2023 ने भी वृद्ध महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा को महत्वपूर्ण चिंता के रूप में रेखांकित किया है।
स्वास्थ्य से आगे है स्वस्थ वृद्धावस्था की अवधारणा
वृद्धावस्था को केवल बीमारी के चश्मे से देखना उचित नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार Healthy Ageing का अर्थ उस कार्यात्मक क्षमता को विकसित और बनाए रखना है, जो व्यक्ति को वृद्धावस्था में भी अपने जीवन और कल्याण के लिए सक्षम बनाती है। इसमें व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक क्षमता के साथ-साथ उसका सामाजिक और भौतिक वातावरण भी महत्वपूर्ण है। बढ़ती उम्र में उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर, दृष्टि और श्रवण संबंधी समस्याएं, हड्डियों और गतिशीलता से जुड़ी परेशानियां तथा डिमेंशिया जैसी स्थितियों का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए वृद्ध स्वास्थ्य नीति का लक्ष्य केवल बीमारी का उपचार नहीं, बल्कि बीमारी की रोकथाम, समय पर जांच, पुनर्वास और लंबे समय तक स्वतंत्र जीवन जीने की क्षमता को बनाए रखना होना चाहिए। इसके लिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर बड़े अस्पतालों तक जेरियाट्रिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना आवश्यक है। नियमित स्वास्थ्य जांच, उचित पोषण, शारीरिक सक्रियता, योग या व्यायाम, पर्याप्त नींद और सामाजिक संपर्क वृद्धावस्था को अधिक स्वस्थ और सक्रिय बनाने में मदद कर सकते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य और अकेलेपन की चुनौती
वृद्धावस्था की चर्चा में मानसिक स्वास्थ्य को अक्सर अपेक्षित महत्व नहीं मिलता। जीवनसाथी, मित्रों या समकालीन लोगों का निधन, बच्चों का दूसरे शहरों या अन्य देशों में बस जाना, सेवानिवृत्ति और सामाजिक भूमिकाओं में बदलाव व्यक्ति के जीवन में खालीपन पैदा कर सकते हैं। अकेलापन केवल साथ न होने की स्थिति नहीं है। कई बार परिवार के बीच रहते हुए भी व्यक्ति स्वयं को अलग-थलग महसूस कर सकता है। इसलिए वृद्धजनों को केवल भोजन, दवा और आवास उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। उन्हें बातचीत, अपनापन, निर्णयों में भागीदारी और सामाजिक सक्रियता की भी आवश्यकता होती है। सामुदायिक केंद्र, वरिष्ठ नागरिक क्लब, पुस्तकालय, सांस्कृतिक गतिविधियां, धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं की सकारात्मक भूमिका तथा पीढ़ियों के बीच संवाद इस दिशा में उपयोगी हो सकते हैं।
परिवार की बदलती संरचना और वृद्धजनों की स्थिति
भारतीय समाज में परिवार परंपरागत रूप से वृद्धजनों की सुरक्षा का प्रमुख आधार रहा है। संयुक्त परिवार में दादा-दादी , चाचा- चाची और नाना-नानी परिवार की दैनिक जिंदगी का हिस्सा होते थे। बदलते रोजगार पैटर्न, शहरीकरण, प्रवासन और एकल परिवारों के विस्तार ने इस व्यवस्था को काफी बदल दिया है। यह बदलाव अपने आप में न तो पूरी तरह सकारात्मक है और न नकारात्मक। एकल परिवारों में भी वृद्ध माता-पिता को सम्मान और देखभाल मिल सकती है, जबकि संयुक्त परिवार में रहते हुए भी उपेक्षा संभव है। इसलिए असली प्रश्न परिवार के आकार से अधिक रिश्तों की गुणवत्ता और जिम्मेदारी का है। परिवार में वृद्धजनों से नियमित संवाद, उनके निर्णयों का सम्मान, उनकी आवश्यकताओं को समझना और उन्हें उपयोगी महसूस कराने वाली भूमिका देना बहुत महत्वपूर्ण है। बच्चों और पोते-पोतियों के साथ उनका संबंध दोनों पीढ़ियों के लिए भावनात्मक और ज्ञानात्मक रूप से समृद्ध हो सकता है।
आर्थिक सुरक्षा : गरिमापूर्ण वृद्धावस्था की आधारशिला
वृद्धावस्था में आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। नौकरी या नियमित रोजगार समाप्त होने के बाद आय के स्रोत सीमित हो सकते हैं, जबकि स्वास्थ्य संबंधी खर्च बढ़ सकते हैं। विशेषकर असंगठित क्षेत्र में जीवन भर काम करने वाले लोगों के सामने पेंशन और नियमित आय का अभाव बड़ी चुनौती बन सकता है। India Ageing Report 2023 के अनुसार भारत के वृद्धजनों में बड़ी संख्या आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से आती है और एक उल्लेखनीय हिस्से के पास स्वयं की नियमित आय नहीं है। आर्थिक सुरक्षा का अर्थ केवल पेंशन देना नहीं है। इसमें सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक आसान पहुंच, स्वास्थ्य खर्च से सुरक्षा, सुरक्षित बैंकिंग, वित्तीय साक्षरता और वृद्ध महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता भी शामिल है।
वृद्धजनों के अधिकार और कानूनी संरक्षण
वृद्धजन केवल कल्याण योजनाओं के लाभार्थी नहीं, बल्कि पूर्ण अधिकारों वाले नागरिक हैं। गरिमा, सुरक्षा, स्वास्थ्य, संपत्ति, सामाजिक भागीदारी और सम्मानजनक जीवन उनके मूल अधिकारों से जुड़े प्रश्न हैं। भारत में Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 वृद्ध माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के रखरखाव तथा कल्याण से संबंधित कानूनी ढांचा प्रदान करता है। लेकिन कानून का होना और उसका प्रभावी क्रियान्वयन दो अलग बातें हैं। वृद्धजनों को अपने अधिकारों की जानकारी होना, शिकायत तंत्र तक उनकी पहुंच और स्थानीय प्रशासन की संवेदनशीलता भी उतनी ही आवश्यक है।
वृद्धजनों के साथ हिंसा, उपेक्षा और शोषण
वृद्धजनों की समस्याओं का एक गंभीर पक्ष उनके साथ होने वाली उपेक्षा और शोषण है। यह शारीरिक हिंसा, मानसिक उत्पीड़न, आर्थिक शोषण, संपत्ति पर दबाव या भावनात्मक उपेक्षा के रूप में सामने आ सकता है। कई मामलों में वृद्धजन परिवार के खिलाफ शिकायत करने से इसलिए बचते हैं क्योंकि उन्हें सामाजिक बदनामी, अकेले पड़ जाने या संबंध टूटने का डर रहता है। इसलिए ऐसी व्यवस्था जरूरी है जहां वे सुरक्षित और गोपनीय तरीके से सहायता प्राप्त कर सकें। यहां पड़ोस, स्थानीय समुदाय, सामाजिक संगठन और प्रशासन की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। वृद्ध व्यक्ति को केवल परिवार का निजी विषय मानकर छोड़ देना कई बार समस्या को और गंभीर बना सकता है।
Ageism : उम्र के आधार पर भेदभाव
वृद्धावस्था से जुड़ी एक कम दिखाई देने वाली समस्या Ageism है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार उम्र के आधार पर बनाए गए रूढ़िगत विचार, पूर्वाग्रह और भेदभाव को एजिज्म कहा जाता है। यह व्यक्ति के स्वास्थ्य, कल्याण और मानवाधिकारों को प्रभावित कर सकता है। किसी वृद्ध व्यक्ति को केवल उम्र के कारण अक्षम मान लेना, उसकी राय को महत्व न देना या यह मान लेना कि वह नई तकनीक सीख नहीं सकता ये सभी उम्र आधारित पूर्वाग्रह के उदाहरण हो सकते हैं। इस मानसिकता को बदलना जरूरी है। उम्र बढ़ना क्षमता के समाप्त होने का प्रमाण नहीं है। अनुभव, धैर्य, निर्णय क्षमता और जीवन की समझ किसी भी समाज की महत्वपूर्ण संपत्ति हैं।
डिजिटल युग में नई चुनौतियां और संभावनाएं
आज बैंकिंग, सरकारी सेवाएं, स्वास्थ्य परामर्श, टिकट बुकिंग और सामाजिक संपर्क तेजी से डिजिटल हो रहे हैं। इससे सुविधा बढ़ी है, लेकिन डिजिटल साक्षरता की कमी वाले वृद्धजनों के लिए नई बाधाएं भी पैदा हुई हैं। UPI, मोबाइल बैंकिंग और ऑनलाइन सेवाओं का इस्तेमाल सीखना उनके लिए उपयोगी हो सकता है। लेकिन साइबर धोखाधड़ी और वित्तीय ठगी से बचाने के लिए विशेष जागरूकता भी आवश्यक है। तकनीक वृद्धावस्था को अधिक सुरक्षित और स्वतंत्र बनाने में मदद कर सकती है। टेलीमेडिसिन, स्वास्थ्य निगरानी उपकरण, आपातकालीन संपर्क प्रणाली और सहायक तकनीकें घर पर रहने वाले वरिष्ठ नागरिकों के लिए उपयोगी हो सकती हैं। पर तकनीक का उपयोग करते समय गोपनीयता, सहमति और डिजिटल सुरक्षा का ध्यान रखना भी जरूरी है।
सरकारी योजनाएं और संस्थागत प्रयास
भारत सरकार ने वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए विभिन्न योजनाएं और कार्यक्रम संचालित किए हैं। Atal Vayo Abhyuday Yojana (AVYAY) का उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार, स्वास्थ्य, पोषण, आश्रय, सुरक्षा और सक्रिय वृद्धावस्था को बढ़ावा देना है। इसके अंतर्गत वरिष्ठ नागरिक गृह, राज्य कार्य योजनाएं, सहायक उपकरण, सक्रिय वृद्धावस्था, अंतर पीढ़ी संबंध और अन्य सेवाओं से जुड़े कार्यक्रम शामिल हैं। सरकार की हालिया पहल में जेरियाट्रिक केयरगिवर्स के प्रशिक्षण और वृद्धजनों के लिए संस्थागत तथा घर-आधारित देखभाल को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है। हालांकि किसी भी योजना की सफलता का वास्तविक आकलन इस बात से होता है कि उसका लाभ जरूरतमंद व्यक्ति तक कितनी आसानी और नियमितता से पहुंचता है। इसलिए जागरूकता, सरल आवेदन प्रक्रिया, स्थानीय स्तर पर सहायता और योजनाओं की निगरानी को समान महत्व देना होगा।
वृद्धाश्रम नहीं, विकल्पों की विविध व्यवस्था
वृद्धाश्रमों को लेकर समाज में कई तरह की धारणाएं हैं। कुछ लोग इसे पारिवारिक विघटन का प्रतीक मानते हैं, जबकि कुछ परिस्थितियों में वृद्धाश्रम या दीर्घकालिक देखभाल केंद्र आवश्यक और उपयोगी हो सकते हैं। हर वृद्ध व्यक्ति की परिस्थिति अलग होती है। किसी को परिवार के साथ रहना पसंद हो सकता है, किसी को स्वतंत्र जीवन, जबकि किसी को निरंतर चिकित्सकीय देखभाल की जरूरत हो सकती है। इसलिए नीति का लक्ष्य केवल वृद्धाश्रमों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि घर पर देखभाल, डे-केयर, सामुदायिक सेवाओं और गुणवत्तापूर्ण दीर्घकालिक देखभाल के विकल्प विकसित करना होना चाहिए। WHO भी वृद्धजनों के लिए व्यक्ति-केंद्रित स्वास्थ्य सेवाओं और आवश्यकता के अनुसार दीर्घकालिक देखभाल की व्यवस्था को स्वस्थ वृद्धावस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है।
सक्रिय वृद्धावस्था : अनुभव को सामाजिक शक्ति में बदलना
वृद्धावस्था का अर्थ सामाजिक जीवन से दूरी नहीं होना चाहिए। वरिष्ठ नागरिक शिक्षा, संस्कृति, साहित्य, कला, सामाजिक सेवा, परामर्श, कृषि, उद्यमिता और सामुदायिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद जीवन का एक नया अध्याय शुरू हो सकता है। किसी वरिष्ठ शिक्षक का अनुभव युवा शिक्षकों के काम आ सकता है, किसी चिकित्सक का अनुभव स्वास्थ्य जागरूकता में उपयोगी हो सकता है और किसी किसान का पारंपरिक ज्ञान नई पीढ़ी तक पहुंच सकता है। इस दृष्टि से Active Ageing केवल स्वास्थ्य की अवधारणा नहीं, बल्कि सामाजिक भागीदारी की भी अवधारणा है। वृद्धजन समाज के निष्क्रिय सदस्य नहीं, बल्कि उसके अनुभव-संपन्न संसाधन हैं।
पीढ़ियों के बीच संवाद की जरूरत
आज की सबसे बड़ी सामाजिक आवश्यकताओं में से एक है पीढ़ियों के बीच संवाद को मजबूत करना। बच्चों और युवाओं को वृद्धजनों के अनुभव से सीखने का अवसर मिलना चाहिए और वृद्धजनों को नई पीढ़ी की बदलती दुनिया को समझने का अवसर। तकनीक, शिक्षा और जीवन शैली के क्षेत्र में युवा पीढ़ी आगे हो सकती है, जबकि इतिहास, रिश्तों, संघर्षों और सामाजिक अनुभव के क्षेत्र में वरिष्ठ पीढ़ी के पास महत्वपूर्ण ज्ञान होता है। दोनों के बीच संवाद समाज को अधिक संतुलित बना सकता है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में वरिष्ठ नागरिकों के अनुभव साझा करने के कार्यक्रम, स्थानीय इतिहास का दस्तावेजीकरण और सामुदायिक गतिविधियां इस दिशा में उपयोगी कदम हो सकते हैं।
भविष्य की तैयारी : Age-friendly समाज की ओर
भारत के सामने अब यह चुनौती है कि वृद्ध आबादी बढ़ने से पहले ही आवश्यक सामाजिक और स्वास्थ्य अवसंरचना तैयार की जाए। भविष्य की योजना में जेरियाट्रिक अस्पतालों के साथ-साथ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, प्रशिक्षित केयरगिवर, घर आधारित देखभाल, वृद्ध-अनुकूल परिवहन और सार्वजनिक स्थानों को शामिल करना होगा। फुटपाथ, सार्वजनिक शौचालय, बसें, रेलवे स्टेशन और सरकारी कार्यालय यदि वृद्ध और दिव्यांग-अनुकूल बनाए जाएं तो इससे केवल वरिष्ठ नागरिकों को ही नहीं, बल्कि पूरे समाज को लाभ होगा। इसी तरह सामाजिक सुरक्षा को जीवन के अंतिम चरण की सहायता के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक नीति के हिस्से के रूप में देखना होगा। वृद्धावस्था की तैयारी वास्तव में जीवन के हर चरण से जुड़ी है।
अनुभव और सम्मान से ही बनेगा वृद्ध-अनुकूल समाज
अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस हमें केवल वृद्धजनों की समस्याओं को याद करने का अवसर नहीं देता, बल्कि यह सोचने का अवसर भी देता है कि हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं। ऐसा समाज, जहां उम्र बढ़ने के साथ व्यक्ति की उपयोगिता और सम्मान कम न हो; जहां बीमारी होने पर उपचार मिले, आर्थिक कठिनाई में सुरक्षा मिले, अकेलेपन में साथ मिले और निर्णय लेने में उसकी आवाज सुनी जाए। बढ़ती वृद्ध आबादी भारत के लिए एक बड़ी सामाजिक चुनौती अवश्य है, लेकिन इसे केवल चुनौती के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह अनुभव, ज्ञान और सामाजिक पूंजी के उपयोग का अवसर भी है। 2050 तक भारत में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या में होने वाली बड़ी वृद्धि यह स्पष्ट करती है कि वृद्धावस्था अब भविष्य का नहीं, बल्कि वर्तमान नीति-निर्माण का विषय है। हमें ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिसमें स्वास्थ्य, आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक सहभागिता, डिजिटल समावेशन, कानूनी संरक्षण और पारिवारिक सम्मान एक-दूसरे से जुड़े हों। परिवार अपनी जिम्मेदारी निभाए, समाज संवेदनशील बने और सरकार ऐसी नीतियां बनाए जो वृद्धजनों को निर्भरता के बजाय गरिमा और अधिकार के साथ जीवन जीने का अवसर दें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वृद्धजनों को केवल देखभाल की जरूरत वाले लोगों के रूप में न देखा जाए। वे अपने साथ जीवन का लंबा अनुभव, संस्कृति की स्मृति और समाज को समझने की गहरी दृष्टि लेकर चलते हैं। संयुक्त राष्ट्र का वर्तमान विमर्श भी वृद्धजनों की आवाज और उनके योगदान को सामाजिक परिवर्तन का हिस्सा बनाने पर जोर देता है। आज हम जिस समाज में वृद्धजनों के साथ व्यवहार करेंगे, वही समाज आने वाली पीढ़ियां हमारे साथ बनाएंगी। इसलिए वृद्ध-अनुकूल समाज बनाना केवल वरिष्ठ नागरिकों के लिए काम करना नहीं, बल्कि अपने ही भविष्य को अधिक सुरक्षित, सम्मानजनक और मानवीय बनाना है।

