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बिहार चुनाव 2025: जंगलराज और घुसपैठियों का डर फिर जनता के मन में

पटना, 11 नवम्बर। बिहार में आज विधानसभा चुनाव का निर्णायक चरण चल रहा है और चुनावी माहौल पहले से कहीं अधिक भय और असुरक्षा से घिरा हुआ है। इस बार के चुनाव में जंगलराज और घुसपैठियों के मुद्दे ने मतदाताओं के मन में गहरा प्रभाव डाला है। जनता का अनुभव बताता है कि यह डर केवल प्रचार का हिस्सा नहीं, बल्कि बीते दौर और वर्तमान में सुरक्षा की वास्तविक कमी का परिणाम है। बीते जंगलराज और वर्तमान घुसपैठियों की उपस्थिति ने जनता के मन में असुरक्षा और भय की छवि को गहरा कर दिया है। आज के चुनाव में यह तय होगा कि जनता ने इस डर को कितना गंभीरता से लिया है और किस दल को अपनी सुरक्षा का भरोसा दिया है।

जंगलराज का काल: जनता की यादें

‘जंगलराज’ शब्द सुनते ही लोगों के जेहन में डकैती, हिंसा और अराजकता की तस्वीर उभरती है। उस दौर में राज्य में कानून-व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी। कई ग्रामीण बताते हैं कि खेतों में काम करना और रात को घर पर रहना भी डरावना था। हर कोई यह सोचकर सोता था कि कहीं अपराधियों का निशाना न बन जाए। शहरों में दुकानें और घर रात के समय बंद रखने के बावजूद चोरी और डकैती की घटनाएं आम थीं। छोटे व्यवसायी सुरक्षा के लिए निजी गार्ड पर निर्भर हो गए थे। महेन्द्र कुशवाहा ने याद करते हुए कहा कि उस समय रात में बाहर निकलना किसी साहसिक काम से कम नहीं था। जंगलराज में हर कोई अपने घर में बंद रहता और डरता था।

घुसपैठियों का असर

प्रो. राकेश तिवारी बताते हैं कि राज्य में अवैध घुसपैठियों की बढ़ती संख्या ने अपराध और असुरक्षा में इजाफा किया। ग्रामीणों और शहरवासियों के अनुसार, बाहरी तत्वों की अनियंत्रित आव्रजन ने रोजगार, जमीन और संसाधनों पर दबाव बढ़ाया। कई इलाकों में लोगों ने कहा कि अवैध घुसपैठियों की उपस्थिति के कारण स्थानीय व्यवस्था बाधित हुई। ग्रामीण क्षेत्रों में जमीन और संपत्ति पर कब्जा करने की घटनाएं बढ़ीं। रोजगार और अवसर सीमित हो गए, जिससे स्थानीय युवाओं में नाराजगी और भय दोनों बढ़े।

अपराध की भयावह घटनाएं

बीते जंगलराज के दौर और घुसपैठियों के बढ़ते प्रभाव ने अपराध की घटनाओं को बढ़ावा दिया है। शिवमूरत चौधरी बताते हैं कि रात में डकैती, लूट और झगड़े आम थे। चोरी और दुकानों पर कब्जा की घटनाएं लगातार बढ़ रही थीं। खेतों और ग्रामीण इलाकों में हिंसक झगड़े और डकैती आम दृश्य बन गए थे। इन घटनाओं ने जनता में भय और असुरक्षा की भावना को गहरा कर दिया।

जनता का डर

महिलाएं और बच्चे घर के अंदर भी सुरक्षित महसूस नहीं करते थे। बुजुर्ग और गरीब वर्ग अपने खेत और घर छोड़कर दूसरों के आश्रय पर निर्भर हो जाते थे। युवाओं में अपराध और हिंसा के डर के कारण शिक्षा और रोजगार की चिंता और बढ़ गई। सुमित्रा देवी ने कहा कि जंगलराज और घुसपैठियों ने हमारी जिंदगी का चैन छीन लिया था। रात में सोना भी डरावना था। महिलाओं का अनुभव सामान्य तौर पर यही बताता है कि घरेलू सरोकारों के साथ-साथ वे सार्वजनिक जगहों पर भी सुरक्षित महसूस नहीं कर पातीं थीं। यह डर चुनावी निर्णयों पर सीधा असर डाल रहा है।