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“मराठी‑विरोधियों को मुंहतोड़ जवाब” – त्रिभाषा नीति पर उद्धव ठाकरे का बयान, नई समिति गठित

शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने सोमवार को राज्य में त्रिभाषा नीति को अस्थायी रूप से वापस लिए जाने का स्वागत करते हुए कहा कि उन्होंने “मराठी-विरोधियों को मुक्का मारा है”। ठाकरे ने कहा कि महाराष्ट्र में भाषा और संस्कृति की एकता बनी रहनी चाहिए और यह फैसला उसी दिशा में एक बड़ी जीत है। उन्होंने बताया कि अब इस मुद्दे पर रिपोर्ट तैयार करने के लिए डॉ. नरेंद्र जाधव के नेतृत्व में एक नई समिति गठित की गई है।

उद्धव ठाकरे ने कहा, “हमने मराठी विरोधियों को मुंहतोड़ जवाब दिया है। यही एकता आगे भी बरकरार रहनी चाहिए। हमने अलग-अलग राजनीतिक मत रखने वाले दलों से भी सहयोग प्राप्त किया है। यदि सरकार ने नीति को रद्द नहीं किया होता, तो 5 जुलाई को विरोध प्रदर्शन तय था। अब, हम उस दिन विजय रैली निकालेंगे।”

ठाकरे ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार ने शिक्षा से जुड़े निर्णयों के लिए वित्तीय विशेषज्ञों को भी नामित किया है। उन्होंने कहा कि फिलहाल सरकार ने दोनों विवादित सरकारी प्रस्तावों को रद्द कर दिया है।

बीजेपी पर बरसे संजय राउत, झूठे दावों का आरोप

इस मुद्दे पर पार्टी सांसद संजय राउत ने भी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि भाजपा झूठ फैलाने में माहिर है और यही उनकी “राष्ट्रीय नीति” बन चुकी है। राउत ने कहा, “अगर उद्धव ठाकरे ने माशेलकर समिति की रिपोर्ट को कभी स्वीकार किया होता, तो वह रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं हुई?”

उन्होंने भाजपा से चुनौतीपूर्ण लहजे में पूछा कि अगर त्रिभाषा नीति पर कोई वैध प्रक्रिया हुई थी, तो कैबिनेट में उस पर खुलकर चर्चा क्यों नहीं की गई। राउत ने देवेंद्र फडणवीस पर निशाना साधते हुए कहा, “तीन बार मुख्यमंत्री रहे फडणवीस से यह उम्मीद नहीं थी कि वह इस तरह से जबरन हिंदी थोपने का समर्थन करेंगे।”

सरकार का रुख और पिछली नीति की पृष्ठभूमि

इससे पहले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 16 अप्रैल और 17 जून को पारित दो विवादित प्रस्तावों को रद्द करने की घोषणा की थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक डॉ. नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता वाली समिति अपनी रिपोर्ट नहीं देती, तब तक त्रिभाषा फार्मूले को लागू नहीं किया जाएगा।

गौरतलब है कि 16 अप्रैल को पारित प्रस्ताव में मराठी और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य तीसरी भाषा बनाया गया था। लेकिन तीखी आलोचना के बाद 17 जून को एक संशोधित प्रस्ताव लाया गया, जिसमें कहा गया कि हिंदी तीसरी भाषा होगी, लेकिन यदि छात्र दूसरी भाषा सीखना चाहते हैं, तो कम से कम 20 इच्छुक छात्रों का समूह होना आवश्यक होगा।महाराष्ट्र में त्रिभाषा नीति को लेकर जारी विवाद फिलहाल शांत होता दिख रहा है। हालांकि, यह मुद्दा राजनीतिक रूप से गरमाया हुआ है और आगामी 5 जुलाई की ‘विजय रैली’ के साथ इसके और अधिक राजनीतिक रंग लेने की संभावना बनी हुई है।