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गंगाजल का स्पर्श और सेवन: गंगा दशहरा की परंपरा

गंगा दशहरा हिंदू धर्म का एक प्रमुख और अत्यंत श्रद्धा से मनाया जाने वाला पर्व है, जो माँ गंगा की पूजा-अर्चना को समर्पित होता है। सनातन धर्म में गंगा नदी को पवित्रतम और मोक्षदायिनी माना गया है। गंगा माता को ‘पतित पावनी’ कहा गया है, जो सभी के पापों का नाश करती हैं और मोक्ष प्रदान करती हैं। यही कारण है कि गंगा दशहरा का दिन हिंदू श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है। यह पर्व हर वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है और अक्सर निर्जला एकादशी से एक दिन पहले आता है।

गंगा दशहरा से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, भगवान श्रीहरि विष्णु के चरणों में सेवारत माँ गंगा को राजा भागीरथ ने अपनी कठिन तपस्या से धरती पर अवतरित होने के लिए प्रसन्न किया। राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाने के लिए ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया, लेकिन यह कार्य माँ गंगा के बिना संभव नहीं था। माँ गंगा का प्रवाह अत्यंत तीव्र था, जिससे धरती पर संकट आ सकता था। इसलिए भागीरथ ने भगवान शिव की तपस्या की। उन्होंने पूरे एक वर्ष तक एक पैर के अंगूठे पर खड़े होकर अन्न-जल त्याग कर भगवान शिव की आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने गंगा को अपनी जटाओं में धारण किया और फिर ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को एक जटा से गंगा को धरती पर मुक्त किया। इसके बाद भागीरथ ने अपने पूर्वजों का गंगाजल से तर्पण कर उन्हें मोक्ष प्रदान किया।

गंगा नदी आज भी हिमालय के गंगोत्री ग्लेशियर से निकलकर बंगाल की खाड़ी के सुंदरबन डेल्टा में समा जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा दशहरा के दिन गंगा स्नान करने से व्यक्ति के दस प्रकार के पाप नष्ट होते हैं। ये पाप हैं: निषिद्ध हिंसा, परस्त्री गमन, बिना अनुमति वस्तु लेना, कठोर वाणी बोलना, दूसरे के धन पर बुरी दृष्टि रखना, दूसरों का बुरा सोचना, व्यर्थ की बातों में हठ करना, झूठ बोलना, चुगली करना और दूसरों का अहित करना।

मत्स्य, गरुड़ और पद्म पुराणों में उल्लेख है कि इस दिन हरिद्वार, प्रयाग या गंगासागर जैसे पवित्र स्थलों पर स्नान करने से व्यक्ति मृत्यु के बाद स्वर्ग प्राप्त करता है और फिर जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति पवित्र नदी तक नहीं जा सकता, तो वह घर के पास की किसी नदी में स्नान करते हुए गंगा का स्मरण करे, और यदि यह भी संभव न हो तो गंगाजल का स्पर्श या सेवन करने से भी पुण्य प्राप्त होता है।

गंगा स्नान करते समय ‘ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः’ मंत्र का जाप करना परम पुण्यदायक माना जाता है। साथ ही ‘गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती, नर्मदे सिन्धु कावेरी जले अस्मिन् सन्निधिम् कुरु’ मंत्र का जप भी स्नान के समय किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार गंगा स्नान से पहले सामान्य जल से स्नान कर लेना चाहिए और फिर पवित्र गंगा में केवल डुबकी लगानी चाहिए। साबुन आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए और स्नान के बाद शरीर को कपड़े से नहीं पोंछना चाहिए—जल को स्वयं सूखने देना चाहिए। मृत्यु या जन्म के सूतक में भी गंगा स्नान किया जा सकता है, लेकिन मासिक धर्म की स्थिति में महिलाओं को गंगा स्नान नहीं करना चाहिए।

यदि व्यक्ति गंगा नदी तक नहीं जा सकता, तो वह घर पर नहाने के पानी में गंगाजल की कुछ बूंदें मिलाकर स्नान कर सकता है और वही पुण्य प्राप्त कर सकता है। गंगा दशहरे के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना चाहिए, फिर स्वच्छ वस्त्र धारण कर सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित करना चाहिए। इस दिन शिवजी और माँ गंगा की संयुक्त रूप से पूजा करनी चाहिए। गंगा स्तोत्र का पाठ करने से शुभ फल प्राप्त होते हैं। अंत में जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या धन का दान करना इस पर्व की पूर्णता मानी जाती है।