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चैत्र नवरात्र का पहला दिन:- प्रतिपदा तिथि, घटस्थापना और मां शैलपुत्री

भारत में हिंदू सनातन संस्कृति के अनुसार नए वर्ष का प्रारम्भ वर्षप्रतिपदा के दिन होता है। वर्षप्रतिपदा की तिथि निर्धारित करने के पीछे कई वैज्ञानिक तथ्य छिपे हुए हैं। ब्रह्मपुराण पर आधारित ग्रन्थ ‘कथा कल्पतरु’ में कहा गया है कि चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय के समय ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी और उसी दिन से सृष्टि संवत की गणना आरम्भ हुई। समस्त पापों को नष्ट करने वाली महाशांति उसी दिन सूर्योदय के साथ आती है।

वर्षप्रतिपदा का स्वागत किस प्रकार करना चाहिए इसका वर्णन भी हमारे शास्त्रों में मिलता है। सर्वप्रथम सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की पूजा ‘ॐ’ का सामूहिक उच्चारण, नए पुष्पों, फलों, मिष्ठानों से युग पूजा और सृष्टि की पूजा करनी चाहिए। सूर्य दर्शन, सुर्यध्र्य प्रणाम, जयजयकार, देव आराधना आदि करना चाहिए। परस्पर मित्रों, सम्बन्धियों, सज्जनों का सम्मान, उपहार, गीत, वाध्य, नृत्य से सामूहिक आनंदोत्सव मनाना चाहिए तथा परस्पर साथ मिल बैठकर समस्त आपसी भेदों को समाप्त करना चाहिए। चूंकि यह ब्रह्मा द्वारा घोषित सर्वश्रेष्ठ तिथि है अत इसको प्रथम पद मिला है, इसलिए इसे प्रतिपदा कहते हैं।

वर्ष प्रतिपदा हिंदू काल गणना पर आधारित है और इसके साथ अन्य कई वैज्ञानिक तथ्य भी जुड़े हैं। इसी दिन वासंतिक नवरात्रि का भी प्रारम्भ होता है और वर्ष प्रतिपदा से ही नौ दिवसीय शक्ति पर्व प्रारम्भ होता है तथा सनातनी हिंदू इसी दिन से शक्ति की भक्ति में लीन हो जाते हैं। सतयुग के खंडकाल में भारतीय (हिन्दू) नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन प्रारंभ हुआ था क्योंकि इसी दिन ब्रह्माजी द्वारा सृष्टि की रचना का प्रारंभ किया गया था। आगे चलकर त्रेतायुग में वर्षप्रतिपदा के दिन ही प्रभु श्रीराम का लंका विजय के बाद राज्याभिषेक हुआ था। भगवान श्रीराम ने वानरों का विशाल सशक्त संगठन बनाकर असुरी शक्तियों (आतंक) का विनाश किया था। इस प्रकार अधर्म पर धर्म की विजय हुई और रामराज्य की स्थापना हुई थी। अगले खंडकाल अर्थात द्वापर युग में युधिष्ठिर संवत का प्रारम्भ भी वर्षप्रतिपदा के दिन हुआ था। महाभारत के धर्मयुद्ध में धर्म की विजय हुई और राजसूय यज्ञ के साथ युधिष्ठिर संवत प्रारम्भ हुआ। आगे कलयुग के खंडकाल में विक्रम संवत प्रारम्भ हुआ। सम्राट विक्रमादित्य की नवरत्न सभा की चर्चा आज भी चहुंओर होती है। यह भारत के परम वैभवशाली इतिहास का एक अति महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इस नवरत्न सभा में निम्नलिखित रत्न शामिल थे – (1) धन्वन्तरि-आर्युवेदाचार्य; (2) वररुचि-व्याकरणचार्य; (3) कालीदास-महाकवि; (4) वराहमिहिर-अंतरिक्षविज्ञानी; (5) शंकु-शिक्षा शाश्त्री; (6) अमरसिंह-साहित्यकार; (7) क्षणपक-न्यायविद दर्शनशास्त्री; (8) घटकर्पर-कवि; (9) वेतालभट्ट-नीतिकार।

माता शैलपुत्री

नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मां शैलपुत्री का स्वरूप- दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प है। शास्त्रों में मां शैलपुत्री चंद्रमा को प्रतिनिधित्व करती है। ज्योतिषियों का कहना है कि माता रानी के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा करने से चंद्रमा के बुरे प्रभाव दूर हो जाते हैं। इनकी पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। जब कोई मां शैलपुत्री की पूजा करता है, तो उसके जीवन में स्थिरता आती है और वह हमेशा अच्छे काम करता है।

कलश को नवरात्रि के पहले दिन स्थापित करने के बाद मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर दैनिक कामों से छुट्टी लेकर स्नान-ध्यान करके मां शैलपुत्री की पूजा करें। इसके बाद, अपने पूजा घर को साफ करो। पूजा घर में एक चौकी पर गंगाजल डालें। इसके बाद एक चौकी पर लाल कपड़ा डालकर माता के सभी चित्रों को उस पर रखें।

अब मां शैलपुत्री की पूजा करने के लिए व्रत का संकल्प लें। माता रानी को अक्षत, धूप, प्रकाश, फूल, फल और मिठाई दें। घी का दीपक जलाकर माता की आरती करें। चंद्रमा की कुंडली में कोई दोष हो या वह कमजोर हो तो आप मां शैलपुत्री की पूजा करनी चाहिए। इससे बहुत लाभ होगा।

मां शैलपुत्री की कहानी: पुराणों में कहा जाता है कि मां शैलपुत्री का दूसरा नाम सती था। एक बार प्रजापति दक्ष ने एक यज्ञ करने का फैसला किया और सभी देवताओं को बुलाया, लेकिन भगवान शिव को नहीं। देवी सती को निमंत्रण नहीं मिलने पर गुस्सा आया। वह अपने पिता के यज्ञ में जाना चाहती थीं, लेकिन भगवान शिव ने उन्हें स्पष्ट रूप से मना किया। उनका कहना था कि कोई निमंत्रण नहीं आया तो वहां नहीं जाना चाहिए। लेकिन सती ने बार-बार आग्रह किया तो शिव को भी स्वीकार करना पड़ा।

सती को प्रजापति दक्ष के यज्ञ में पहुंचकर अपमान महसूस हुआ। उनसे सभी ने मुंह फेर लिया। उन्हें केवल उनकी माता ने प्यार से गले लगाया। वहीं उनकी बहने भोलेनाथ को बदनाम कर रही थीं। राजा दक्ष खुद माता सती का अपमान कर रहे थे। इस तरह का अपमान सहन न करने पर सती अग्नि में कूद गई और मर गई।
भगवान शिव क्रोधित हो गए और पूरे यज्ञ को ध्वस्त कर दिया। तब सती ने हिमालय में पार्वती का जन्म लिया। जहां उन्होंने शैलपुत्री नाम लिया। माना जाता है कि मां शैलपुत्री काशी की नगरी वाराणसी में रहती हैं।