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शिक्षाप्रद कहानी:- परिश्रम में ही छिपा है सच्चा सुख

सुमेरू और कुबेरू दो दोस्त थे। दोनों जंगल में रहते थे, वे दोनों शहद का छत्ता तोड़कर उसमें से शहद निकालकर बाजार में बेचते और रूखा-सूखा जैसा भी भोजन मिलता, खा लेते। बरसात के दिनों में उन्हें बड़ी कठिनाई होती थी। इन दिनों में न वे जंगल में शहद लेने जा सकते थे और न ही लकड़ियां, क्योंकि पेड़ गीले होकर फिसलाऊ हो जाते थे और जंगली रास्ते कीचड़ से भर जाते थे।

एक दिन लगातार बरसात से परेशान होकर सुमेरू ने

कहा- “कुबेरू, अब क्या करें?” कुबेरू बोला- “मेरी तो कुछ समझ में नहीं आता। कहां जाएं?”

सुमेरू ने सलाह दी – “दोस्त, कहां जा सकते हैं। बरसात ने सारे रास्ते बंद कर दिए हैं। अब तो भगवान ही इस मुसीबत से बचा सकते हैं।”

भगवान का नाम सुनते ही कुबेरू कुछ सोचने लगा। उसने सोचा- ‘यदि सचमुच भगवान मिल जाएं तो मैं उनसे जादू का वे
एक थाल मांगूंगा। यह थाल मुझे जीवन-भर बढ़िया-बढ़िया भोजन खिलाता रहेगा। न बरसात की चिंता होगी और न ही शहद तोड़कर बेचने की।’

सुमेरू ने भी भगवान से मन-ही-मन धंधे की बात कही। इस तरह सोचते-सोचते वे सो गए। सुबह-सुबह उनकी झोंपड़ी के सामने एक साधु महाराज पधारे। दोनों ने उनका आदर किया। घर में जैसा भी रूखा-सूखा भोजन था, वह प्रेम से कराया। उसी दिन बरसात भी नहीं हुई। उन्हें बहुत-सा शहद भी मिला। दोनों ने साधु महाराज की कई दिनों तक सेवा की। एक दिन शाम के समय साधु ने उनसे कहा- “मैं तुम दोनों के आतिथ्य-सत्कार से प्रसन्न हूं। मांगो, तुम क्या मांगते हो?”

दोनों यह सुनकर बड़े खुश हुए। सुमेरू बोला -“महाराज हमें सोचने के लिए एक रात का समय दीजिए। प्रातः काल हम आपसे अपने-अपने मन की बात कहेंगे।”

साधु बोले-“ठीक है। सुबह तुम अपने नेत्र बंद करके जो भी मांगोगे, वही तुम्हें मिल जाएगा।”

दोनों को रात-भर नींद नहीं आई। वे इस प्रकार लेटे रहे, मानो सो रहे हों। दोनों का मन बड़ी-बड़ी चीजें मांगने की सोच रहे थे। कुबेरू को तो संसार के बढ़िया-बढ़िया पकवान खाने की बड़ी इच्छा होती थी। सुमेरू का मन अपनी सेहत की चिंता अधिक करता था।
दोनों सुबह उठे और साधु महात्मा ने जैसा कहा था, उन्होंने वैसा ही किया। दोनों झोंपड़ी से बाहर आए। साधु महात्मा जा चुके थे। पर दोनों को उनकी वस्तुएं दे गए थे।

कुबेरू ने सुमेरू से पूछा “सुमेरू, तुमने क्या मांगा?” सुमेरू बोला “दोस्त, आदमी की सेहत अच्छी है तो सब सब अच्छा है | तुम मुझे ‘रूखां-सूखा भोजन दे सकते हो? तुम थाली का दिया भोजन खा लिया करो।”

सुमेरू बोला “नहीं कुबेरू, मुझे तो यही रूखा-सूखा भोजन पच जाता है। बिना मेहनत से मिलने वाला भोजन पेट में पचता नहीं है। अनेक बीमारियां पैदा करता है। तुम्हारा यह हाल इसीलिए हुआ है।”

सुमेरू यह कहकर अपने काम पर चला गया। अब कुबेरू को बात समझ में आई। वह जादू की थाली मांगकर पछताने लगा। वह थाली लेकर पास ही नदी के किनारे पहुंचा और कहने लगा- “हे भगवान! आपकी जादू की थाली में लौटा रहा हूं। आपके दिए हाथ-पैरों से जो कुछ कमाऊंगा, बस वही खाऊंगा। मुझे माफ करना।” यह कहकर उसने थाली नदी में फेंक दी। सुमेरू के साथ वह भी मेहनत करने लगा। धीरे-धीरे उसका मोटापा भी कम हो गया। अब वह बीमार भी नहीं रहता था। उससे जो भी मिलता, उसे भी वह यही सीख देता था अपने हाथ-पैरों की मेहनत और ईमानदारी से कमाया धन भगवान के वरदान से भी अच्छा है।’