प्रेरक प्रसंग अध्याय 15:- मन के हारे हार है
कपिल वस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ जो आगे चलकर ‘गौतम बुध्द’ हुए और जिन्होंने ‘बौद्ध धर्म’ की स्थपना की, गृह त्यागकर निकले, तो बोध की खोज में काफी भटके | आखिर उनकी हिम्मत टूटने लगी | उनके मन में यह विचार बार-बार उठने लगा कि क्यों न वापस राजमहल चला जाये, और अंत में एक दिन वे कपिलवस्तु की ओर लौट ही पड़े | चलते-चलते राह में उन्हें प्यास लगी | सामने ही एक झील थी | वे उसके किनारे गये, तभी उनकी दृष्टी एक गिलहरी पर पड़ी| गिलहरी कोई दुर्लभ जीव नहीं, किन्तु उस गिलहरी की चेष्टाओं ने सिद्धार्थ का ध्यान विशेष रूप से आकर्षित किया | बात यह थी कि वह गिलहरी बार-बार पानी के पास जाती, अपनी पूंछ उसमें डुबोती और उसे निकालकर रेट पर झटक देती |
सिद्धार्थ से न रहा गया | वे पूछ ही बैठे, नन्ही गिलहरी, यह क्या कर रही हो तुम?
इस झील को सुखा रही हूँ, उसने उत्तर दिया |
यह काम तो तुमसे कभी न हो पायेगा,’ सिद्धार्थ बोले, ‘भले ही तुम हजार बरस जियो और करोड़ों-अरबों बार अपनी पूंछ पानी में डुबाकर झटको, किन्तु झील को सुखाना तुम्हारे बस की बात नहीं |’
‘तुम्हीं ऐसा मानो, मैं नहीं मानती | मैं तो यह जानती हूँ कि मन में जिस कार्य को करने का निश्चय किया, उस पर अटल रहने से वह हो ही जाता है | मैं अपना काम करती रहूंगी|’ और वह अपनी पूंछ डुबोने झील की ओर चल पड़ी |
गिलहरी की बात सिद्धार्थ के हृदय में गड़ गयी| उन्हें अपने मन की निर्बलता महसूस हुई | वे वापस लौटे और फिर तप में निरत हो गये|

