National

देशबंधु की जयंती पर याद आया योगदान

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास ऐसे महान सेनानियों और राष्ट्रभक्तों के योगदान से समृद्ध है, जिन्होंने देश को आजाद कराने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। इन्हीं महान व्यक्तित्वों में चित्तरंजन दास का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। वे एक प्रखर वकील, कुशल राजनीतिज्ञ, समाजसेवी और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रभावशाली नेता थे। देशभर में उन्हें प्यार और सम्मान से ‘देशबंधु’ के नाम से जाना जाता है। चित्तरंजन दास ने न केवल अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाई, बल्कि भारतीयों में आत्मसम्मान, स्वराज और राष्ट्रीय एकता की भावना को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी जयंती हमें उनके त्याग, संघर्ष, विचारों और राष्ट्र के प्रति समर्पण को याद करने का अवसर देती है। चित्तरंजन दास का जन्म 5 नवंबर 1870 को बंगाल के कलकत्ता में हुआ था।

उनका परिवार शिक्षित और सामाजिक चेतना से जुड़ा हुआ था। उनके पिता भुवन मोहन दास पेशे से वकील थे और सामाजिक तथा बौद्धिक गतिविधियों में रुचि रखते थे। परिवार के वातावरण ने चित्तरंजन दास के व्यक्तित्व को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बचपन से ही उनमें शिक्षा, विचारशीलता और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव दिखाई देने लगा था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त की और आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए। वहां उन्होंने कानून की पढ़ाई की और बैरिस्टर बने। भारत लौटने के बाद उन्होंने वकालत शुरू की और जल्द ही अपनी प्रतिभा, तर्कशक्ति तथा कानूनी समझ के कारण प्रतिष्ठित वकीलों में गिने जाने लगे।

चित्तरंजन दास के जीवन में वर्ष 1908 का अलीपुर बम कांड एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। इस मामले में उन्होंने क्रांतिकारी अरविंद घोष का बचाव किया और अपनी शानदार कानूनी दलीलों से उन्हें बरी कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस मुकदमे ने उन्हें देशभर में पहचान दिलाई। हालांकि, चित्तरंजन दास के लिए वकालत केवल पेशा नहीं थी, बल्कि न्याय और अधिकारों की रक्षा का माध्यम भी थी। वे अपनी कानूनी प्रतिभा का उपयोग उन लोगों की सहायता के लिए करते थे, जो अंग्रेजी शासन की नीतियों से प्रभावित थे। उनकी निर्भीकता और देशभक्ति ने उन्हें आम लोगों के बीच लोकप्रिय बना दिया।

 

स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका वर्ष 1917 के बाद और अधिक मजबूत हुई। उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के माध्यम से देश की आजादी की आवाज को बुलंद किया। वे अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों और भारतीयों के अधिकारों के हनन के खिलाफ लगातार आवाज उठाते रहे। वर्ष 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद देश में आक्रोश का माहौल था। इस दौरान चित्तरंजन दास ने पंजाब में अत्याचारों की जांच के लिए गठित गैर-सरकारी समिति में भी भूमिका निभाई। उनका मानना था कि किसी भी देश की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब वहां के नागरिकों को सम्मान, समानता और स्वतंत्रता प्राप्त हो। वे स्वराज को केवल राजनीतिक सत्ता का परिवर्तन नहीं, बल्कि आम जनता के अधिकारों और सम्मान की स्थापना मानते थे।

 

महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुए असहयोग आंदोलन में चित्तरंजन दास ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 1920 में उन्होंने आंदोलन का समर्थन करते हुए अपनी बेहद सफल और लाभदायक वकालत छोड़ दी। यह फैसला उनके त्याग और राष्ट्र के प्रति समर्पण का बड़ा उदाहरण था। उन्होंने विदेशी वस्त्रों और विलासिता की चीजों का त्याग किया तथा स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने का संदेश दिया। उनके इस कदम ने देश के युवाओं और आम नागरिकों को स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ने की प्रेरणा दी। उनकी पत्नी बसंती देवी और पुत्र ने भी राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। परिवार सहित देशसेवा के प्रति उनका समर्पण उस दौर में लोगों के लिए प्रेरणा बन गया था।

चित्तरंजन दास का मानना था कि भारत की आजादी के लिए केवल आंदोलन करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था के भीतर रहकर भी अंग्रेजी शासन की नीतियों का विरोध करना जरूरी है। इसी सोच के तहत उन्होंने पंडित मोतीलाल नेहरू के साथ मिलकर वर्ष 1923 में स्वराज पार्टी की स्थापना की। इस पार्टी का उद्देश्य विधान परिषदों में प्रवेश करके ब्रिटिश सरकार की नीतियों का विरोध करना और स्वशासन की मांग को मजबूत करना था। स्वराज पार्टी ने चुनावों में उल्लेखनीय सफलता हासिल की और भारतीय राजनीति में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराई। चित्तरंजन दास की राजनीतिक दूरदर्शिता ने स्वतंत्रता आंदोलन को एक नई दिशा देने में योगदान दिया। वर्ष 1924 में वे कलकत्ता नगर निगम के महापौर बने। इस पद पर रहते हुए उन्होंने प्रशासनिक सुधारों और जनकल्याण से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता दी।

 

चित्तरंजन दास केवल स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिज्ञ ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील साहित्यकार और विचारक भी थे। उन्हें साहित्य से गहरा लगाव था और उन्होंने बंगाली भाषा में कविताएं तथा लेख लिखे। उनकी रचनाओं में देशप्रेम, मानवीय संवेदना, सामाजिक चेतना और आध्यात्मिक विचारों की झलक दिखाई देती है। उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में ‘सागर संगीत’, ‘माला’, ‘अंतर्यामी’ और ‘किशोर-किशोरी’ का उल्लेख किया जाता है। उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से भी राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने का प्रयास किया। वे मानते थे कि साहित्य और शिक्षा समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के प्रभावशाली माध्यम हैं। उनका विचार था कि भारतीय भाषाओं में शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि आम नागरिक भी ज्ञान और जागरूकता से जुड़ सकें।

 

सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में भी चित्तरंजन दास के विचार प्रगतिशील थे। वे महिलाओं की शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और सामाजिक समानता के समर्थक थे। जातिगत भेदभाव और छुआछूत जैसी कुरीतियों के खिलाफ उनका स्पष्ट रुख था। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत का निर्माण तभी संभव है, जब समाज के प्रत्येक वर्ग को समान अवसर और सम्मान मिले। वे हिंदू-मुस्लिम एकता के भी प्रबल समर्थक थे। वर्ष 1923 में बंगाल पैक्ट के माध्यम से उन्होंने दोनों समुदायों के बीच राजनीतिक सहयोग और आपसी सद्भाव बढ़ाने का प्रयास किया। उनका विश्वास था कि धार्मिक और सामाजिक विविधता भारत की ताकत है और देश की उन्नति के लिए सभी समुदायों को मिलकर आगे बढ़ना चाहिए।

चित्तरंजन दास के व्यक्तित्व का एक और महत्वपूर्ण पहलू उनका त्याग और उदारता था। उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से ऊपर उठकर देश और समाज के हित को प्राथमिकता दी। वे चाहते थे कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे। उनके विचारों और कार्यों से प्रभावित होकर अनेक युवा स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े। नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी उन्हें अपना राजनीतिक मार्गदर्शक मानते थे। चित्तरंजन दास ने युवाओं को राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने की प्रेरणा दी। वे मानते थे कि युवाओं की ऊर्जा, शिक्षा और संकल्प किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। उनकी सोच में स्वतंत्रता का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से मजबूत भारत का निर्माण भी था।

लगातार संघर्ष और व्यस्त राजनीतिक जीवन के कारण उनका स्वास्थ्य प्रभावित होने लगा। 16 जून 1925 को दार्जिलिंग में मात्र 55 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनके निधन से पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। महात्मा गांधी सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। उनके जाने से स्वतंत्रता आंदोलन ने एक प्रभावशाली नेता खो दिया, लेकिन उनके विचार और आदर्श हमेशा के लिए भारतीय इतिहास का हिस्सा बन गए। देश के प्रति उनके असाधारण योगदान के कारण ही उन्हें ‘देशबंधु’ की उपाधि से याद किया जाता है।

चित्तरंजन दास की जयंती केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का भी दिन है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची देशभक्ति केवल नारों तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसके लिए त्याग, ईमानदारी, साहस और समाज के प्रति जिम्मेदारी की भावना जरूरी है। उन्होंने अपने कार्यों से साबित किया कि एक व्यक्ति भी अपने संकल्प और कर्मों के बल पर समाज में बड़ा बदलाव ला सकता है। आज जब भारत विकास, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और आर्थिक प्रगति के नए रास्तों पर आगे बढ़ रहा है, तब देशबंधु के विचार और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। उनका जीवन युवाओं को राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने, सामाजिक एकता बनाए रखने और शिक्षा के माध्यम से समाज को मजबूत बनाने की प्रेरणा देता है। चित्तरंजन दास की जयंती पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके त्याग, समर्पण और राष्ट्रप्रेम से प्रेरणा लेकर एक शिक्षित, समरस, आत्मनिर्भर और मजबूत भारत के निर्माण में अपना योगदान दें।