Entertainment

मूवी रिव्यू: चमक-दमक से सजी, मगर भावनात्मक रूप से खोखली है ‘कॉकटेल 2’

जब 2012 में आई ‘कॉकटेल’ ने दोस्ती, प्यार और दिल टूटने की भावनाओं को एक ताज़गीभरे अंदाज़ में पेश किया था, तब उसने दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई थी। लेकिन ‘कॉकटेल 2’ उसी विरासत को आगे बढ़ाने के बजाय एक ऐसी चमकदार लेकिन भावनात्मक रूप से खोखली कहानी बनकर सामने आती है, जो अपने किरदारों और रिश्तों के साथ न्याय नहीं कर पाती। फिल्म देखने के दौरान कई बार ऐसा महसूस होता है कि यह किसी महंगे रियलिटी शो का सिनेमाई संस्करण है, जहां रिश्तों की गहराई से ज्यादा महत्व ड्रामा, ग्लैमर और कृत्रिम टकराव को दिया गया है।

कहानी

कहानी कुणाल और दीया के लंबे रिश्ते के इर्द-गिर्द घूमती है, जो वर्षों से साथ हैं और शादी को महज एक औपचारिकता मानते हैं। उनकी जिंदगी में तब उथल-पुथल मचती है जब एली की एंट्री होती है। इसके बाद फिल्म प्रेम, आकर्षण, प्रतिबद्धता और रिश्तों के बदलते स्वरूप पर सवाल उठाने की कोशिश करती है। समस्या यह है कि फिल्म जिन रिश्तों पर आधारित है, उन्हीं रिश्तों को विश्वसनीय बनाने में असफल रहती है। दर्शकों को कभी यह महसूस नहीं होता कि कुणाल और दीया के बीच वास्तव में इतना गहरा रिश्ता है कि उसके टूटने का दर्द महसूस किया जा सके। वहीं एली और कुणाल के बीच विकसित होता आकर्षण भी सतही और बनावटी लगता है। फिल्म कई दिलचस्प सवाल जरूर उठाती है, लेकिन उनके जवाब खोजने के बजाय बार-बार ग्लैमरस दृश्यों और भावनात्मक उथल-पुथल में उलझ जाती है।

निर्देशन

होमी अदजानिया आधुनिक रिश्तों की जटिलताओं को दिखाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कहानी भावनात्मक स्तर पर दर्शकों से जुड़ नहीं पाती। फिल्म का सबसे बड़ा दोष इसकी पटकथा है, जो किरदारों को स्वाभाविक तरीके से विकसित करने के बजाय उन्हें कहानी की सुविधा के अनुसार चलाती है। कई महत्वपूर्ण फैसले और टकराव इतने कृत्रिम लगते हैं कि दर्शक उनसे जुड़ नहीं पाते। दो घंटे से अधिक की अवधि में फिल्म बार-बार उन्हीं भावनात्मक संघर्षों को दोहराती है, जिससे कहानी धीरे-धीरे थकाने लगती है।

अभिनय

शाहिद कपूर फिल्म के सबसे प्रभावशाली कलाकार साबित होते हैं। सीमित और असंतुलित लेखन के बावजूद वह अपने किरदार को ईमानदारी से निभाते हैं। कई दृश्यों में उनका अभिनय फिल्म को संभालने की कोशिश करता है। कृति सेनन ग्लैमरस और आत्मविश्वासी किरदार में आकर्षक लगती हैं, लेकिन उनका चरित्र इतना असंगत लिखा गया है कि दर्शक उसके व्यवहार और फैसलों को समझ नहीं पाते। कई जगह उनका किरदार केवल कहानी में तनाव पैदा करने का माध्यम बनकर रह जाता है। रश्मिका मंदाना के साथ फिल्म सबसे ज्यादा अन्याय करती है। उनके किरदार को जरूरत से ज्यादा असुरक्षित, भावुक और एकतरफा तरीके से प्रस्तुत किया गया है। एक प्रतिभाशाली अभिनेत्री होने के बावजूद उन्हें ऐसा किरदार मिला है जो कभी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाता। तीनों कलाकार अपने स्तर पर मेहनत करते हैं, लेकिन कमजोर लेखन उनके अभिनय के प्रभाव को सीमित कर देता है।

तकनीकी पक्ष

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसकी दृश्यात्मक भव्यता है। सिसिली की खूबसूरत लोकेशंस, स्टाइलिश सिनेमैटोग्राफी और आकर्षक प्रोडक्शन डिजाइन हर फ्रेम को शानदार बनाते हैं। संगीत भी फिल्म को कुछ हद तक सहारा देता है और कई गाने सुनने में अच्छे लगते हैं। लेकिन सिर्फ खूबसूरत लोकेशंस और अच्छे गाने किसी कमजोर कहानी की भरपाई नहीं कर सकते।

फाइनल वर्डिक्ट

‘कॉकटेल 2’ एक ऐसी फिल्म है जो रिश्तों, प्यार और दोस्ती पर गंभीर बात करना चाहती है, लेकिन अंततः सतही भावनाओं और बनावटी ड्रामे में उलझकर रह जाती है। फिल्म आधुनिक रिश्तों की जटिलताओं को दिखाने का दावा तो करती है, लेकिन उनके भावनात्मक सच को पकड़ने में नाकाम रहती है।

शानदार लोकेशंस, स्टाइलिश प्रस्तुति और अच्छे कलाकारों के बावजूद फिल्म दिल को छूने वाली प्रेम कहानी नहीं बन पाती। अंत में आपको इसके खूबसूरत दृश्य और गाने तो याद रहते हैं, लेकिन किरदारों की भावनाएं और उनकी कहानी कहीं पीछे छूट जाती है।