मूवी रिव्यू : इतिहास और विचारधारा के विवादित सवालों को बेबाकी से उठाती है ‘आखिरी सवाल’
लोकेश चंद्र दुबे
कलाकार: संजय दत्त, नमाशी चक्रवर्ती, समीरा रेड्डी, अमित साध, नीतू चन्द्रा श्रीवास्तव, पूजा त्रिधा चौधरी, मृणाल कुलकर्णी
निर्देशक: अभिजीत मोहन वारंग
निर्माता: निखिल नंदा, संजय दत्त
रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐ (4/5)
आज के दौर में जब फिल्मों में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को छूने से अक्सर परहेज किया जाता है, ऐसे समय में ‘आखिरी सवाल’ एक साहसी और विचारोत्तेजक फिल्म बनकर सामने आती है। यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि दर्शकों को इतिहास, विचारधारा और मीडिया की भूमिका पर सोचने के लिए मजबूर करती है। निर्देशक अभिजीत मोहन वारंग ने संवेदनशील विषय को बहस और संवाद के जरिए बेहद प्रभावशाली अंदाज में पेश किया है।
कहानी
फिल्म की कहानी मुंबई के कॉलेज छात्र विक्की के इर्द-गिर्द घूमती है, जो आरएसएस पर लिखी अपनी पीएचडी थीसिस को प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी द्वारा खारिज किए जाने के बाद उनसे भिड़ जाता है। बहस इतनी बढ़ जाती है कि मामला सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनलों तक पहुंच जाता है। इसके बाद विक्की प्रोफेसर के सामने इतिहास और विचारधारा से जुड़े कई विवादित सवाल रखता है, जिनका जवाब पूरे देश के सामने दिया जाता है।
कहानी सिर्फ एक छात्र और प्रोफेसर के बीच की बहस नहीं रह जाती, बल्कि यह राष्ट्रीय स्तर की वैचारिक बहस का रूप ले लेती है। फिल्म में आरएसएस, मीडिया ट्रायल, राजनीतिक सोच और समाज में फैले वैचारिक मतभेदों को दिलचस्प तरीके से प्रस्तुत किया गया है। खास बात यह है कि फिल्म किसी एक पक्ष का प्रचार करती हुई नहीं लगती, बल्कि दोनों विचारधाराओं को अपनी बात रखने का मौका देती है।
स्टारकास्ट और परफॉर्मेंस
प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी के किरदार में संजय दत्त बेहद प्रभावशाली नजर आते हैं। उनका गंभीर अभिनय, संवाद अदायगी और स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को मजबूती देते हैं। कई दृश्यों में उनका शांत लेकिन तीखा अंदाज दर्शकों पर गहरा असर छोड़ता है। नमाशी चक्रवर्ती ने विक्की के किरदार को पूरी ईमानदारी के साथ निभाया है। गुस्सा, असमंजस और सवालों से भरे युवा छात्र की भूमिका में वह काफी प्रभाव छोड़ते हैं। यह उनके करियर की अब तक की सबसे मजबूत परफॉर्मेंस कही जा सकती है। अमित साध एक तेज-तर्रार न्यूज़ एंकर के किरदार में जमे हैं और कहानी को गति देते हैं। समीरा रेड्डी अपने किरदार में अलग अंदाज में नजर आती हैं और नकारात्मक शेड्स में प्रभावित करती हैं। नीतू चंद्रा, त्रिधा चौधरी और मृणाल कुलकर्णी भी अपने-अपने किरदारों में कहानी को संतुलन और भावनात्मक गहराई देती हैं।
निर्देशन
निर्देशक अभिजीत मोहन वारंग ने इतने संवेदनशील और विवादित विषय को संतुलित तरीके से संभालने की कोशिश की है। फिल्म का पहला हाफ काफी मजबूत और रोचक है, जहां छात्र और प्रोफेसर के बीच की वैचारिक टक्कर दर्शकों को बांधे रखती है। फिल्म के संवाद इसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। कई बहस वाले दृश्य लंबे समय तक याद रहते हैं। निर्देशक ने नाटकीयता और तथ्यों के बीच अच्छा संतुलन बनाया है। हालांकि कुछ हिस्सों में बहस थोड़ी लंबी महसूस होती है, लेकिन विषय की गंभीरता को देखते हुए यह जरूरी भी लगता है।
फाइनल वर्डिक्ट
‘आखिरी सवाल’ एक साहसी और प्रभावशाली डिबेट ड्रामा है, जो इतिहास और विचारधारा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को बड़े पर्दे पर बेबाकी से उठाती है। फिल्म बाबरी मस्जिद विध्वंस और महात्मा गांधी की हत्या जैसे विवादित विषयों को भी बहस और तथ्यों के जरिए पेश करने की कोशिश करती है।
दमदार अभिनय, मजबूत संवाद और संतुलित निर्देशन के कारण यह फिल्म सिर्फ एक राजनीतिक ड्रामा नहीं बनती, बल्कि एक ऐसी बहस बन जाती है जो थिएटर से बाहर निकलने के बाद भी लंबे समय तक दर्शकों के मन में बनी रहती है। अगर आप कंटेंट आधारित और विचारोत्तेजक सिनेमा पसंद करते हैं, तो ‘आखिरी सवाल’ जरूर देखनी चाहिए।

