महंगाई दर 4% से नीचे रहने का अनुमान, ब्याज दरों पर राहत के संकेत
13 जनवरी । भारत इस समय तेज आर्थिक विकास और कम महंगाई के संतुलित दौर से गुजर रहा है, जिसे अर्थशास्त्री ‘गोल्डीलॉक्स फेज’ के रूप में देख रहे हैं। मंगलवार को जारी एचएसबीसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा हालात में नीतियों को न तो बहुत सख्त और न ही बहुत ढीला रखा जाना चाहिए, बल्कि एक संतुलित यानी लगभग तटस्थ नीति अपनाना ज्यादा उपयुक्त होगा।
2026 के लिए संतुलित नीति को बताया सबसे बेहतर विकल्प
एचएसबीसी ग्लोबल इन्वेस्टमेंट रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में बाजार और पूरी अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए ऐसी नीति सबसे बेहतर होगी, जिसमें सरकारी खर्च पर नियंत्रण रखा जाए और ब्याज दरें आसान बनी रहें। रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे विकास और स्थिरता के बीच बेहतर संतुलन बन सकता है।
सरकारी खर्च और ब्याज दरों में तालमेल जरूरी
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर सरकार खर्च को लेकर सतर्क रहती है और रिजर्व बैंक ब्याज दरों को आसान बनाए रखता है, तो इससे अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और सभी तरह के निवेश को फायदा पहुंचेगा। इससे बाजार में भरोसा भी बना रहेगा।
अंदरूनी कमजोरियों पर दी गई चेतावनी
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी आगाह किया गया है कि अर्थव्यवस्था में कुछ अंदरूनी कमजोरियां अब भी मौजूद हैं। इनमें कंपनियों द्वारा अपेक्षाकृत कम निवेश और विदेशों से सीमित पूंजी प्रवाह शामिल है, जिन पर नीति स्तर पर ध्यान देना जरूरी है।
बॉन्ड मार्केट और विदेशी निवेश पर नजर
रिपोर्ट में कहा गया है कि बॉन्ड मार्केट्स ने 2026 की शुरुआत में राज्यों द्वारा अधिक कर्ज लेने की संभावना को पहले ही ध्यान में रख लिया है। इसके साथ ही आरबीआई द्वारा बॉन्ड खरीद, बजट में वित्तीय अनुशासन और भारत को ग्लोबल बॉन्ड इंडेक्स में शामिल किए जाने से विदेशी निवेश बढ़ने की उम्मीद जताई गई है।
शेयर बाजार को मिल सकता है समर्थन
एचएसबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, हाल के आर्थिक सुधारों, जीडीपी में बढ़ोतरी और शेयरों के उचित मूल्यांकन की वजह से शेयर बाजार को समर्थन मिल सकता है। हालांकि, लंबे समय तक टिकाऊ लाभ के लिए कंपनियों के निवेश और विदेशी निवेश को बढ़ाने वाले बड़े सुधार जरूरी बताए गए हैं।
महंगाई 4% से नीचे रहने का अनुमान
एचएसबीसी की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी ने कहा कि उनकी रिसर्च फर्म के अनुमान के मुताबिक अगले साल महंगाई दर 4% से थोड़ी कम रह सकती है। इससे आरबीआई पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव नहीं रहेगा और अगर विकास की रफ्तार धीमी पड़ती है, तो दरों में और कटौती की गुंजाइश भी बनी रहेगी।
बाजार की सोच से अलग आकलन
प्रांजुल भंडारी ने कहा कि अगर विकास दर कमजोर होती है, तो और राहत दी जा सकती है। यह आकलन बाजार की मौजूदा सोच से उलट है, जहां आम तौर पर सख्त मौद्रिक नीति और ढीली वित्तीय नीति की उम्मीद की जा रही है।
वैश्विक घटनाओं का भी पड़ेगा असर
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि वैश्विक स्तर पर कई घटनाक्रम चल रहे हैं, जैसे टैरिफ से जुड़ी खबरें, ग्लोबल बॉन्ड इंडेक्स में भारत को शामिल किए जाने की प्रक्रिया और विकसित देशों में ब्याज दरों में बढ़ोतरी, जिनका असर भारतीय बाजार पर पड़ सकता है।
2031 तक सार्वजनिक कर्ज घटाने का लक्ष्य
रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार का लक्ष्य वर्ष 2031 तक सार्वजनिक कर्ज को महामारी से पहले के स्तर तक लाना है। इसके लिए अगले पांच वर्षों तक लगातार वित्तीय सुधार और खर्च पर सख्त नियंत्रण जरूरी होगा।
निजीकरण से वित्तीय संतुलन की उम्मीद
एचएसबीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्र सरकार द्वारा यह वित्तीय संतुलन निजीकरण के जरिए हासिल किया जा सकता है, जिससे आर्थिक विकास पर ज्यादा नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।
राज्यों के कर्ज पर भी रखी गई सीमा
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई राज्यों में सार्वजनिक कर्ज बढ़ने की संभावना है, लेकिन 3% की वित्तीय घाटे की सीमा लागू होने के कारण घाटे को नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी।

