इंडोनेशिया की खोज ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों में खलबली
इंडोनेशिया के वेस्ट जावा में स्थित गुनुंग पादांग ने मॉडर्न आर्कियोलॉजी में बहस छेड़ दी है। यह सीढ़ीदार टीला लंबे समय से पवित्र माना जाता रहा है। 2023 में रिसर्चर्स ने एक पेपर प्रकाशित किया, जिसमें दावा किया गया कि गुनुंग पादांग दुनिया का सबसे पुराना ज्ञात पिरामिड हो सकता है, जिसकी उम्र 25,000 साल है, यानी खेती या संगठित सभ्यता के उदय से भी बहुत पहले।
स्टडी के मुख्य लेखक, जियोलॉजिस्ट डैनी हिलमैन नताविदजाजा ने कहा कि ज़मीन के नीचे कई लेवल की बनावट में एडवांस्ड कंस्ट्रक्शन तकनीक के निशान दिखाई देते हैं। अगर यह सही होता, तो यह साइट अभी की सबसे पुरानी पुष्टि की गई साइट, गोबेकली टेपे, से लगभग 14,000 साल पुरानी होती।
लेकिन इस दावे को तुरंत ही आलोचना का सामना करना पड़ा। आर्कियोलॉजिस्ट और जियोलॉजिस्ट्स ने इन नतीजों को अंदाज़ा बताया और कहा कि ये पारंपरिक आर्कियोलॉजिकल सबूतों पर आधारित नहीं हैं। कुछ ही महीनों में, जर्नल Archaeological Prospection ने कम डेटा और मेथड में कमियों का हवाला देते हुए रिसर्च पेपर वापस ले लिया।
नताविदजाजा की टीम ने ज़मीन के नीचे चार चट्टानी परतें खोजीं। उन्होंने रडार और ड्रिलिंग जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया। इन परतों की मिट्टी के सैंपल की रेडियोकार्बन डेटिंग से पता चला कि वे 25,000 साल पुराने हैं। लेखकों ने इसे इंसानी बनावट का सबूत माना, जिसमें खंभों जैसी चट्टानें और ज़मीन के नीचे बने कमरे शामिल थे, जो पिरामिड जैसा स्ट्रक्चर बनाते थे।
लेकिन वैज्ञानिकों ने इसे खारिज कर दिया। डॉ. फ्लिंट डिबल जैसे विशेषज्ञों का कहना था कि पेपर उनके दावे का समर्थन नहीं करता। रेडियोकार्बन डेटिंग केवल मिट्टी में मौजूद ऑर्गेनिक मैटर की उम्र बताती है, बनावट की नहीं। इसके अलावा, औजारों, हड्डियों, मिट्टी के बर्तनों या नक्काशी का कोई सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि यह इंसानी गतिविधि का परिणाम है।

