RTE को लेकर बॉम्बे हाई कोर्ट ने सरकार को दिया झटका, महाराष्ट्र के प्राइवेट स्कूलों को छूट देने का फैसला रद्द
बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले के बाद मुंबई सहित राज्य के प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को मुफ्त शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत ऐडमिशन की आस लगाए बैठे पैरेंट और उनके बच्चों को बड़ी राहत मिली है। हाई कोर्ट के फैसले के चंद घंटे के बाद ही प्राथमिक शिक्षा निदेशालय ने ऐडमिशन को लेकर सर्कुलर जारी कर दिया है।
मुंबई : बॉम्बे हाई कोर्ट ने आरटीई (शिक्षा का अधिकार कानून) ऐडमिशन को लेकर राज्य सरकार को बड़ा झटका दिया है। शुक्रवार को कोर्ट ने सरकार की 9 फरवरी, 2024 की उस अधिसूचना को रद्द कर दिया है, जिसमें सरकारी अथवा सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के एक किमी के दायरे में स्थित निजी स्कूलों को RTE कोटा से छूट दी गई थी। कोर्ट ने माना है कि सरकार की अधिसूचना RTE अधिनियम और संविधान के अनुच्छेद 21 के दायरे के बाहर है। लिहाजा इसे लागू नहीं किया जा सकता है। इस तरह कोर्ट सरकार की नोटिफिकेशन को अमान्य घोषित कर उसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह फैसला कई अभिभावकों और गैर सरकारी संस्था विधायक भारती की याचिका पर सुनवाई के बाद सुनाया है। याचिका में दावा किया गया था कि अधिसूचना बच्चों के शिक्षा के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करती है और यह आरटीई अधिनियम के विपरीत है। बता दें कि RTE के तहत गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में 25% सीटें कमजोर तबके वाले छात्रों के लिए आरक्षित रखी गई हैं। इन सीटों पर ऐडमिशन लेने वाले छात्रों की फीस का भुगतान सरकार करती है।
‘अंतरिम रोक से पहले के ऐडमिशन रहेंगे कायम’
कोर्ट ने 6 मई को अदालत के अगले आदेश तक अधिसूचना के आधार शिक्षा विभाग की ओर से 6 मार्च और 3 अप्रैल को जारी सर्कुलर पर अंतरिम रोक लगाई थी। इसके मद्देनज़र चीफ जस्टिस डी़ के़ उपाध्याय को बेंच ने स्पष्ट किया है कि रोक से पहले वंचित वर्गों के छात्रों के दाख़िले को यथावत रखा जाए, इसमें किसी प्रकार की कोई गड़बड़ी न की जाए।
‘सीट बढ़ाने के लिए आवेदन करने की छूट’
बेंच ने आगे कहा कि किसी भी स्थिति में निजी गैर-अनुदानित स्कूल की कक्षा एक की कुल सीटों में से 25% सीटें आरटीई अधिनियम के तहत भरी जाए। यदि ज़रूरत हो, तो ऐसे स्कूल शिक्षा विभाग के संबंधित अधिकारी को आवश्यक विवरण देकर सीट बढ़ाने के लिए आवेदन कर सकते हैं। इससे पहले कोर्ट ने माना था कि सर्कुलर आरटीई के तहत बच्चों को मिले मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के हक का उल्लंघन करते हैं। गौरतलब है कि इस वर्ष पूरे महाराष्ट्र के स्कूलों में आरटीई के तहत एक लाख सीटों पर ऐडमिशन के लिए ढाई लाख से अधिक आवेदन प्राप्त हुए है। आरटीई अधिनियम नागरिक पालिका, सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों निजी गैर अनुदानित स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए ऐडमिशन में कोटा प्रदान करता है।
यह दी गईं दलीलें
इससे पहले याचिकाकर्ता का पक्ष रखने वाली सीनियर ऐडवोकेट गायत्री सिंह ने दावा किया था कि सरकार की अधिसूचना स्कूलों के दायित्व को कम करती है। इसलिए इस पर रोक लगाई जानी चाहिए। यह आरटीई अधिनियम के उद्देश्य और प्रावधानों के विपरीत है। वहीं सरकारी वकील सरकार की अधिसूचना के बचाव करते हुए याचिका में दिए गए तर्कों और आशंकाओं को निराधार बताया था।
ये हैं सरकार के तर्क
– राज्य सरकार और लोकल अथॉरिटी ने मिलकर प्रदेश में 65061 स्कूल स्थापित किए हैं।
– सरकार 24152 निजी अनुदानित स्कूलों को ग्रांट देती है।
– सरकार वेतन और अध्यापन तकनीक में 75597.21 करोड़ रुपये खर्च कर रही है।
– कोर्ट ने सार्वजनिक निधि को बचाने के लिए नोटिफिकेशन जारी करने के तर्क को खारिज़ किया है।
– कोर्ट ने कहा कि आथिक तंगी वैधानिक आदेश के आड़े नहीं आ सकती।
– निजी स्कूलों को शर्त के तहत दी गई छूट संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिले मौलिक अधिकार का उल्लंघन करती है।

