30 जून पुण्यतिथि विशेष:- लड़कियों की पढ़ाई पर ज़ोर देने वाले दादाभाई नौरोजी
1892 में ब्रिटेन के संसद में एक भारतीय चुनकर पहुंचा. दादाभाई नौरोजी (1825-1917) की पहचान सिर्फ़ इतनी ही नहीं है कि वह ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में पहुंचने वाले एशिया के पहले शख्स थे. महात्मा गांधी से पहले वो भारत के सबसे प्रमुख नेता थे. दुनिया भर में नौरोजी जातिवाद और साम्राज्यवाद के विरोधी की तरह भी जाने जाते थे.
उनका जीवन इस बात का गवाह है कि कैसे प्रगतिशील राजनीतिक शक्ति इतिहास के काले अध्यायों में भी एक रोशनी की किरण की तरह है.
नौरोजी का जन्म बॉम्बे के एक ग़रीब परिवार में हुआ था. वह उस वक़्त फ़्री पब्लिक स्कूलिंग के नए प्रयोग का हिस्सा थे. उनका मानना था कि लोगों की सेवा ही उनके शिक्षा का नैतिक ऋण चुकाने का ज़रिया है.
कम उम्र से ही उनका जुड़ाव प्रगतिशील विचारों से रहा.
लड़कियों की पढ़ाई पर ज़ोर दिया
1840 के दशक में उन्होंने लड़कियों के लिए स्कूल खोला जिसके कारण रूढ़िवादी पुरुषों के विरोध का सामना करना पड़ा. लेकिन उनमें अपनी बात को सही तरीक़े से रखने और हवा का रुख़ मोड़ने के अद्भुत क्षमता थी.
पांच साल के अंदर ही बॉम्बे का लड़कियों का स्कूल छात्राओं से भरा नज़र आने लगा. नौरोजी के इरादे और मज़बूत हो गए और वह लैंगिक समानता की मांग करने लगे. नौरोजी का कहना था कि भारतीय एक दिन ये समझेंगे कि “महिलाओं को दुनिया में अपने अधिकारों का इस्तेमाल, सुविधाओं और कर्तव्यों का पालन करने का उतना ही अधिकार है जितना एक पुरुष को”
धीरे-धीरे, भारत में महिला शिक्षा को लेकर नौरोजी ने लोगों की राय को बदलने में मदद की.
दादाभाई नौरोजी ड्रेन
दादाभाई नौरोजी की जीवनी में ड्रेन थ्योरी शामिल है, जिसे “ड्रेन ऑफ़ वेल्थ” थ्योरी के नाम से भी जाना जाता है, जो ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान भारत के आर्थिक शोषण पर चर्चा में एक महत्वपूर्ण योगदान था। दादाभाई नौरोजी के ड्रेन थ्योरी के बारे में कुछ मुख्य बातें इस प्रकार हैं
दादाभाई नौरोजी ने तर्क दिया कि भारतीय वस्तुओं पर उच्च शुल्क लगाने और भारत से कच्चे माल के निर्यात सहित ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों के कारण भारत से ब्रिटेन की ओर धन का शुद्ध बहिर्वाह हुआ।
उन्होंने अनुमान लगाया कि भारत को ब्रिटेन के कारण प्रति वर्ष लगभग 30 मिलियन पाउंड का नुकसान हो रहा है, जो उनके अनुसार भारत की गरीबी का एक प्रमुख कारण है।
दादाभाई नौरोजी ने तर्क दिया कि धन का यह पलायन टिकाऊ नहीं है और यदि यह जारी रहा तो अंततः भारत का पतन हो जाएगा।
उनके सिद्धांत ने भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलनों को प्रेरित करने में मदद की और ब्रिटिश शासन से भारतीय स्वतंत्रता की मांग को बढ़ावा दिया।
दादाभाई नौरोजी ने 1901 में प्रकाशित अपनी पुस्तक “पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया” में अपना ड्रेन थ्योरी प्रस्तुत किया।
दादाभाई नौरोजी योगदान
1. दादाभाई नौरोजी ने पहली भारतीय कंपनी कामा एंड कंपनी में साझेदारी की थी।
2. उन्होंने 1874 में बड़ौदा के महाराजा के दीवान के रूप में कार्य किया।
3. दादाभाई नौरोजी ने 1856 में लंदन इंडियन सोसाइटी और 1867 में ईस्ट इंडियन एसोसिएशन की स्थापना की।
4. उन्होंने 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
5. दादाभाई नौरोजी के निष्कासन सिद्धांत के परिणामस्वरूप 1896 में भारतीय व्यय की जांच के लिए एक शाही आयोग की स्थापना की गई।
6. वह राजनीति में सांख्यिकी का प्रयोग करने वाले पहले व्यक्ति थे, तथा उन्होंने अपने निष्कासन सिद्धांत के समर्थन में आंकड़े उपलब्ध कराए।
7. भारत के वकील दादाभाई नौरोजी 1886, 1893 और 1906 में कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे।
8. उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले, बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गांधी जैसे प्रभावशाली नेताओं का मार्गदर्शन किया।
9. वर्ष 2014 में भारत-यूनाइटेड किंगडम संबंधों में योगदान को मान्यता देने के लिए दादाभाई नौरोजी पुरस्कारों की शुरुआत की गई।

