जयंती विशेष:- ‘प्रकृति के सुकुमार कवि’ सुमित्रानंदन पंत जी के अनमोल विचार और रचनाएं
हिन्दी साहित्य की अनमोल मणियों में से एक कवि सुमित्रानंदन पंत जी भी थी, जिन्होंने हिंदी साहित्य के लिए अपना अविस्मरणीय योगदान दिया। ‘प्रकृति के सुकुमार कवि’ सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 को बागेश्वर ज़िले के कौसानी में हुआ था, जो कि आज के उत्तराखंड राज्य में पड़ता है। जन्म के कुछ ही घंटों बाद उनकी माता की मृत्यु हो गई थी, जिस कारण उनका लालन-पालन उनकी दादी ने किया था। सुमित्रानंदन पंत जी का बचपन का नाम गोसाईं दत्त रखा गया था।
सुमित्रानंदन पंत जी ने प्रयाग में अपनी उच्च शिक्षा के दौरान वर्ष 1921 में हुए, असहयोग आंदोलन में महात्मा गाँधी के बहिष्कार के आह्वान का समर्थन किया। इस आंदोलन के चलते उन्होंने महाविद्यालय को छोड़ दिया और हिंदी, संस्कृत, बांग्ला और अँग्रेज़ी भाषा-साहित्य के स्वाध्याय में लग गए।
प्रयाग ही वह नगरी है जहाँ उनकी काव्य-चेतना का विकास हुआ था, हालाँकि पंत जी ने नियमित रूप से कविताएँ लिखने की यात्रा अपनी किशोर आयु से ही प्रारम्भ कर दी थी। उनका रचनाकाल 1916 से 1977 तक रहा, पंत जी ने अपने जीवन में हिन्दी साहित्य के लिए लगभग 60 वर्षों तक की निरंतर सेवा की।
सुमित्रानंदन पंत जी की काव्य-यात्रा के तीन चरण देखे जाते हैं। इन्हीं तीन चरणों में उनकी पूरी काव्य यात्रा की झलकियां देखने को मिल जाती है। पंत जी की कविताओं ने सदैव समाज को जागृत रखने में अपना योगदान दिया। उन्होंने हिन्दी साहित्य में अपनी रचनाओं के आधार पर खूब यश कमाया। 28 दिसंबर 1977 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में सुमित्रानंदन पंत जी का निधन हुआ और वह सदा के लिए पंचतत्व में विलीन हो गए।
अनमोल विचार
1. हिंदी हमारे राष्ट्र की अभिव्यक्ति का सरलतम स्रोत है।
2. जीना अपने ही मैं एक महान कर्म है।
3. यदि स्वर्ग कही है पृथ्वी पर, तो वह नारी उर के भीतर;
मादकता जग में अगर कहीं, वह नारी अधरों में डूबकर;
यदि कहीं नरक है इस भू, पर तो वह भी नारी के अंदर।
4. जीने का हो सदुपयोग यह मनुष्य का धर्म है।
5. प्रकृति से प्यार करना आपको सुखी जीवन की तरफ बढ़ा देता है।
6. वियोगी होगा पहला कवि , आह से उपजा होगा गान;
उमड़ कर आंखों से चुपचाप वहीं होगी कविता अनजान।
7. ज्ञानी बनकर मत नीरस उपदेश दीजिए।
लोक कर्म भाव सत्य प्रथम सत्कर्म कीजिए।
8. वह सरल, विरल, काली रेखा तम के तागे सी जो हिल-डुल;
चलती लघु पद पल-पल मिल-जुल।
9. मैं मौन रहा,
फिर सतह कहां
बहती जाओ, बहती जाओ
बहती जीवन धारा में
शायद कभी लौट आओ तुम।
10. मैंने छुटपन में छिपकर पैसे बोए थे,
सोचा था, पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे।
रुपयों का कलदार मधुर फसलें खनकेंगी
फूल फलकर मैं मोटा सेठ बनूंगा।
पर बंजर धरती में एक ना अंकूर…
सुमित्रानंदन पंत जी की 2 विशेष रचनाएं
सुमित्रानंदन पंत की कविताएं उनके समय के सामाजिक परिपेक्ष्य में स्वतंत्रता, शिक्षा और समाज में उनकी भूमिका को दर्शाने वाली हैं। हिंदी साहित्य में उनके महान और महत्वपूर्ण योगदान के कारण ही, उनको ‘प्रकृति के सुकुमार कवि’ का स्थान प्राप्त था। सुमित्रानंदन पंत जी की 2 विशेष रचनाएं निम्नलिखित हैं;
भारत माता
सुमित्रानंदन पंत की कविताएं आपकी जीवनशैली में साकारत्मक बदलाव कर सकती हैं, सुमित्रानंदन पंत जी की कविताओं की श्रेणी में एक कविता “भारत माता” भी है, जो कि पीढ़ी दर पीढ़ी भारत माता के प्रति समर्पण का संदेश देती आई है, साथ ही इस कविता ने वर्तमान समय में भी राष्ट्रवाद की अलख को जलाए रखा है।
भारतमाता
ग्रामवासिनी।
खेतों में फैला है श्यामल
धूल भरा मैला सा आँचल,
गंगा यमुना में आँसू जल,
मिट्टी की प्रतिमा
उदासिनी।
दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,
अधरों में चिर नीरव रोदन,
युग युग के तम से विषण्णा मन,
वह अपने घर में
प्रवासिनी।
तीस कोटि संतान नग्न तन,
अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्र जन,
मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,
नत मस्तक
तरु तल निवासिनी!
स्वर्ण शस्य पर-पदतल लुंठित,
धरती सा सहिष्णु मन कुंठित,
क्रंदन कंपित अधर मौन स्मित,
राहु ग्रसित
शरदेंदु हासिनी।
चिंतित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित,
नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित,
आनन श्री छाया शशि उपमित,
ज्ञान मूढ़
गीता प्रकाशिनी!
सफल आज उसका तप संयम,
पिला अहिंसा स्तन्य सुधोपम,
हरती जन मन भय, भव तम भ्रम,
जग जननी
जीवन विकासिनी!
ज्योति भारत
सुमित्रानंदन पंत की कविताएं आपकी जीवनशैली में साकारत्मक बदलाव कर सकती हैं, सुमित्रानंदन पंत जी की कविताओं की श्रेणी में एक कविता “ज्योति भारत” भी है, जो कि मातृभूमि के प्रति आस्था और सम्मान के भाव पर आधारित है।
ज्योति भूमि,
जय भारत देश!
ज्योति चरण धर जहाँ सभ्यता
उतरी तेजोन्मेष!
समाधिस्थ सौंदर्य हिमालय,
श्वेत शांति आत्मानुभूति लय,
गंगा यमुना जल ज्योतिर्मय
हँसता जहाँ अशेष!
फूटे जहाँ ज्योति के निर्झर
ज्ञान भक्ति गीता वंशी स्वर,
पूर्ण काम जिस चेतन रज पर
लोटे हँस लोकेश!
रक्तस्नात मूर्छित धरती पर
बरसा अमृत ज्योति स्वर्णिम कर,
दिव्य चेतना का प्लावन भर
दो जग को आदेश!

