चाणक्य नीति: ईश्वर प्राथना
प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम् |
नाना शास्त्रोद्धातं वक्ष्ये राजनीति समुच्चयम् |
तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) के स्वामी भगवान विष्णु के चरणों में शीष नवाकर प्रणाम करके अनेक शास्त्रों से उद्धृत राजनीति के संकलन का वर्णन करता हूं |
चाणक्य यहाँ राजनीति-सम्बन्धी विचारों के प्रतिपादन के समय कार्य के निर्विघ्न समाप्ति के भाव से कहते हैं कि- मैं कौटिल्य सबसे पहले तीनों लोकों के स्वामी भगवान विष्णु को सिर नवाकर प्रणाम करता हूँ | मैंने अनेक शास्त्रों से चुन-चुनकर राजनीति की बातें एकत्रित की हैं | यहाँ मैं इन्हीं का वर्णन करता हूँ |
चाणक्य (विष्णुगुप्त) के लिए कौटिल्य का सम्बोधन इनके कूटनीति में प्रवीण होने के कारण प्रयोग किया है | यह एक तथ्य है कि चाणक्य की नीति राजा एवं प्रजा ,दोनों के लिए ही प्रयोग किए जाने के लिए थी | राजा के द्वारा निर्वाह किए जानेवाला प्रजा के प्रति धर्म ही राज धर्म कहा गया है और प्रजा द्वारा राजा अथवा राष्ट्र के प्रति निर्वाह किया गया धर्म ही प्रजा-धर्म कहा गया | इस धर्म का उपदेश ही नीतिवचन के रूप में निर्विघ्न पूर्ण हो इसी आशय से प्रारंभ में मंगलवार के रूप में विष्णु की आराधना से कार्यारम्भ किया गया है|

