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राम बनाम प्रणिती शिंदे में ओवैसी-आंबेडकर ने बिगाड़ा गणित, BJP के लिए आसान नहीं सोलापुर सीट, जानें समीकरण

महाराष्ट्र में 11 सीटों पर 7 मई को होने वाले लोकसभा चुनाव के तीसरे चरण के लिए चुनाव प्रचार रविवार को खत्म हो गया और मतदान की सारी तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। सोलापुर लोकसभा सीट पर भी वोटिंग 7 मई को होगी। इससे पहले आपको यहां का समीकरण बताते हैं।
सोलापुर: 2014 और 2019 में मोदी लहर में बीजेपी ने सोलापुर सीट यहां के कद्दावर नेता सुशील कुमार शिंदे को हरा कर जीती थी। सोलापुर में शिंदे के वर्चस्व को खतरे में डाल दिया था। अब बीजेपी ने इस सीट पर जीत की हैट्रिक के लिए पिछले दो चुनाव की तरह प्रत्याशी बदल दिया है। बीजेपी ने विधायक राम सातपुते के सहारे यहां हैट्रिक का तानाबाना बुना है। वहीं, कांग्रेस ने वापसी की उम्मीद में शिंदे की जगह उनकी विधायक बेटी प्रणिती शिंदे को मैदान में उतारा है। यूं तो इस सीट से 21 उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन मुख्य मुकाबला सातपुते बनाम प्रणिती के बीच है। एमआईएम ने इस सीट से अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है, तो वहीं प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाडी ने निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन दिया है। इससे कांग्रेस उम्मीदवार प्रणिती को फायदा मिलने की उम्मीद है। वहीं, बीजेपी विरोधी मत एक होने से उसके उम्मीदवार की राह मुश्किल हो गई है।

कर्नाटक और तेलंगाना बॉर्डर से सटी इस लोकसभा सीट पर मराठी, मुस्लिम, दलित और तेलंगाना से वर्षों पहले आकर बसे पद्मशाली समाज चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाता है। वंचित एवं एमआईएम का उम्मीदवार न होने से वोटों का ध्रुवीकरण होने की बात कही जा रही है।
2019 के उलट राजनीतिक समीकरण
2019 में सुशील कुमार शिंदे के खिलाफ बीजेपी ने वीर शैव लिंगायत समाज के गौडगांव मठ के जय सिद्धेश्वर शिवाचार्य महास्वामी को उम्मीदवार बनाया था। वहीं, वंचित के आंबेडकर खुद एमआईएम के साथ गठबंधन कर इस सीट से चुनाव लड़ रहे थे। 2019 के चुनाव में आंबेडकर को 1.70 लाख वोट मिले थे। शिंदे बीजेपी उम्मीदवार से 1.58 लाख वोटों से हार गए थे यानी शिंदे की हार के पीछे एमआईएम और वंचित का गठजोड़ था। वहीं, बीजेपी के वोट एकमुश्त जय सिद्धेश्वर को मिले, जिससे वह बड़ी जीत दर्ज कर सके। 2024 में स्थिति पूरी तरह से पलट गई है। वंचित के उम्मीदवार राहुल गायकवाड ने आखिरी समय में नामांकन वापस ले लिया और कांग्रेस में शामिल हो गए। वहीं, एमआईएम ने अपना उम्मीदवार ही इस सीट पर नहीं उतारा है। इससे बीजेपी विरोधी वोट का बंटवारा इस बार के चुनाव में होने की उम्मीद कम है।
वंचित और एमआईएम के दलित और मुस्लिम वोटर्स के बीजेपी के खिलाफ जाने का अनुमान है, इसका लाभ प्रणिती को मिलने की उम्मीद है। स्थानीय लोगों का भी मानना है कि इस बार सोलापुर में 2014 और 2019 की तरह लहर बीजेपी के पक्ष में दिखाई नहीं दे रही है। इससे बीजेपी की इस सीट से जीत की हैट्रिक लगाने की राह काफी मुश्किल दिखाई दे रही है। वहीं, बीजेपी नेता विजय सिंह मोहिते पाटील के बीजेपी छोड़कर शरद पवार के साथ जाने से भी स्थिति काफी बदल गई है।
कई मुद्दे हैं सोलापुर में
पश्चिम महाराष्ट्र का मैनचेस्टर कहा जाने वाला सोलापुर आज भी कई सुविधाओं से वंचित है, जबकि यहां से सुशील राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और केंद्र में यूपीए सरकार के दौरान कई महत्वपूर्ण विभाग संभाल चुके हैं। इस सीट के अंतर्गत 6 विधानसभा में से 4 सीट पर बीजेपी के विधायक हैं, एक पर एनसीपी और प्रणिती सोलापुर सिटी सेंट्रल से इकलौती कांग्रेस विधायक हैं। खास बात यह है कि सातपुते बगल की माढा लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाले मालाशिरास विधानसभा सीट से विधायक हैं। सोलापुर में पानी की समस्या, एयरपोर्ट का रुका काम, एयरपोर्ट के नाम पर सिद्धेश्वर सहकारी चीनी मिल की चिमनी गिराना, ट्रैफिक जाम से निजात के लिए फ्लाइओवर का निर्माण और स्मार्ट सिटी बनाने का बीजेपी का वादा चुनाव बीजेपी को भारी पड़ सकता है। इसी सीट के अंतर्गत अक्कलकोट और पंढरपुर का हिस्सा आता है, जहां लाखों लोग आते हैं। इन धार्मिक स्थलों को विकसित कर धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दिया जा सकता है, लेकिन अब तक किसी सरकार ने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
मोदी-योगी, पवार-उद्धव की सभाएं
सोलापुर सीट बीजेपी के लिए कितनी महत्वपूर्ण इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सभाएं कर चुके हैं। वहीं, कांग्रेस उम्मीदवार के लिए शरद पवार और उद्धव ठाकरे आ चुके हैं। सोलापुर सिटी नॉर्थ से बीजेपी विधायक विजय देशमुख कहते हैं कि मोदी और योगी की सभा के बाद माहौल पूरी तरह बदल गया है। हमें पूरा भरोसा है कि इस सीट पर बीजेपी हैट्रिक लगाएगी। पीएम मोदी यहां अपने भाषण में हिंदुत्व के साथ दलित, ओबीसी और अन्य पिछड़ों के विकास का रोड मैप बता चुके हैं। उन्होंने इस पर भी सफाई दी थी कि बीजेपी के सत्ता में आने पर संविधान बदल जाएगा, यह बकवास है।
विरासत बनाम बीजेपी की लड़ाई
पिछले 40 साल की राजनीति में सोलापुर और सुशील एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। इसके बाद भी उन्हें बीच-बीच में चुनावी झटका बीजेपी ने दिया है। 2014 और 2019 का लोकसभा चुनाव इसकी पुष्टि करता है। हालांकि, शिंदे 1998, 99 और 2009 में यहां से लोकसभा पहुंचे थे। इस बार उनकी बेटी मैदान में हैं। भले ही लोग कहें कि यह विधायक बनाम विधायक का मुकाबला है, लेकिन असल में विरासत बनाम बीजेपी का मुकाबला है। प्रणिती के सामने पिता की विरासत बचाने की चुनौती है। वहीं, सातपुते को मोदी और बीजेपी का भरोसा कायम रखना है। बीजेपी उम्मीदवार के लिए जहां चुनौती ज्यादा है।
ज्यादा वोटिंग पर फोकस: देशमुख: सोलापुर सिटी नॉर्थ के बीजेपी विधायक विजय देशमुख का कहना है कि यहां गर्मी बहुत ज्यादा है। हमारी कोशिश है कि वोटिंग के दिन ज्यादा से ज्यादा लोग मतदान केंद्र तक आएं। इसके लिए पार्टी कार्यकर्ता दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। उनका दावा है कि शहरी मतदाता एकतरफा बीजेपी के साथ हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में आमने-सामने की लड़ाई है। यहां से सुशील मुख्यमंत्री रहे, केंद्र में मंत्री रहे, लेकिन उन्होंने विकास नहीं किया। उसी का नतीजा है कि लोग उन्हें पसंद नहीं करते, इसलिए हार के डर से कांग्रेस ने उनकी बेटी को टिकट दिया है। एमआईएम एवं वंचित का उम्मीदवार न होने से मुकाबला सीधा कांग्रेस बनाम बीजेपी है।