शिक्षाप्रद कहानी :- वैधव्य
समुद्र हिलोरे ले रहा था। चांदनी छिटकी हुई थी। वह झोंपड़ी से निकलकर बाहर आया। गांव की कच्ची, टूटी-सी झोंपड़ियों के बीच बन गई पगडंडियों से होता हुआ समुद्र की ओर बढ़ा। समुद्र की गर्जन और उसके दिल की धड़कन में आज समान गति थी। वह सोच रहा था- ‘क्यों तीन प्राणियों को रात पानी-पी पीकर गुजारनी पड़ी। उसकी मां की आंखों के आंसू क्यों सूख गए थे। उसने अपने आपको देखा। आज वह अपने बचपन के खेल से दूर था। आज उसे महसूस हुआ कि पिता कैसे घर की समस्याओं से जूझते हैं। मां घर के कामकाज के अलावा क्यों धान की खेती में भी काम करने जाती हैं। पत्तों की चटाइयां क्यों बनाती हैं।’ आज उसका मन समुद्र की उठती हुई लहरों को दबाने का प्रयत्न कर रहा था।
अगले दिन सुबह उसने अपने पिता से आग्रह किया कि वह भी उनके साथ मछली पकड़ने जाएगा। पिता दस वर्ष के बालक या के उत्साह को देख, इसका विरोध न कर पाए। अब वह अपने पिता के कंधे-से-कंधा मिलाकर चलने लगा। तीन पेट और छह हाथ जीवन में समृद्धि की चमक दिखाई देने लगी। भाग्य और पुरुषार्थ दोनों में होड़ लग गई। समुद्र में न जाने किस और मछलियों का तूफान आ गया। पर्यटकों की टोलियों ने आकर गांव के पास ही डेरे डाल दिए। कृष्णन और उसके पिता इयर मछलियां पकड़कर लाते और उधर पर्यटकों द्वारा खरीदी जाती। तीनों प्राणी भर पेट भोजन करते, भविष्य के लिए धन एक करते और चैन की नींद सोते । समुद्र के इस तट की मछलियों के आगमन की खबर दूर-दूर तक फैल गई। अनेक कम्पनियों अपने-अपने खेमे ले इस तटीय मैदान में आ पहुंची। रात-दिन अपनी नावों और बडे-बडे जालों को लेकर समुद्र में मीलों का सफर तय करते और मछली रूपी धन एकत्र करते ।
भाग्य कैसे-कैसे रंग दिखाता है। मानो समुद्र की लहर आई और फिर चली गई। इन मछलियों की कम्पनियों के आगमन और पर्यटकों के चले जाने पर गांव के निवासियों की रोजी-रोटी छिन गई। ये लोग पुरुषार्थ से जितनी भी मछलियां पकड़ते, इन्हे पास के कस्बे में बेचने ले जाते। निराशा हाथ लगती। भावों में गिरावट के कारण बहुत कम पैसे ले घर लौटते । कम्पनियों की बेती पर मछलियां सस्ते भावों पर आसपास के कस्बों और छोटे शहरों में छा गईं। भाग्य की जीत हुई। पुरुषार्थ हार गया।
हां, एक उपकार इन अस्थायी कम्पनी वालों ने गांव वालों प्रशंस पर किया कि बहुत-से नौजवानों और मेहनतकश पुरुषों को मछलियां पकड़ने का रोजगार दे दिया।
कृष्णन के पिता गणेशन ने भी एक कम्पनी में नौकरी कर कम्पनी के अफसर गणेशन के परिश्रम और उसकी लगन को देखकर बहुत संतुष्ट थे | उसने एक महीने ही हुए थे कम्पनी के लिए काम करते | वे प्रातः अपनी नाव को लेकर मीलों -जाते और शाम को मछलियों दूर से भरी नाव लेकर लौटते । धीरे इससे कम्पनी को अधिकतम लाभ होने लगा। पुनः भाग्य ने मानो पुरुषार्थ के सामने हथियार डाल दिए । अच्छा वेतन, ऊंचा पद, सम्मान, गणेशन को इन तीन महीने में क्या नहीं मिला। गांव की पंचायत में उसे पूछा जाने लगा। उसकी जाति के समृद्ध लोगों आई का उससे मिलना-जुलना बढने लगा। ईर्ष्यालु लोगों की छाती पर मन सांप लोटने लगे। उससे मुखौटा लगाकर बात करते और बोरी आस्तीन का सांप बने रहते। कृष्णन की मां पार्वती हर त्यौहार हे पर मुहल्ले में प्रसाद बांटती। मुहल्ले की औरतों में एक झूठा के सम्मान पाती। वे उसका प्रसाद तो प्रशंसा के वाक्य सुनकर ले लेतीं, पर उसे ग्रहण नहीं करतीं, बल्कि उसके जाने के बाद किसी भिखारी को दे देतीं। मंदिर की पौढ़ी पर उसकी अनुपस्थिति में जलन भरी बातें करतीं, व्यंग्य बाण छोड़तीं। उसके आते ही प्रशंसा करतीं और बहाना बना तितर-बितर हो जातीं। कृष्णन का सम्मान बालकों में बहुत था। स्वाभावानुसार अब वह बालकों की श्रेणी में गिना जाता। अभावों के थपेड़ों ने उसमें समझदारी की जो चमक पैदा कर दी थी, वह उसमें धन की अधिकता ये भी रही। वह पैसे को मेहनत की अभावों के दिन वह भूला नहीं कमाई समझकर खर्च करता। था। जब उसे रात-रात को मुखा सभी प्रशंसको ने फेर लिया था। । यह सा सोना पड़ता था। वह यह समझता था कि इन उसके माता-पिता से उनकी गरीबी में कैसे मुंह ऊंची जाति वाले लोग कैसे पल्लू बचाकर चलते थे। बातें उसे आज भी याद थीं। कभी-कभी वह एकांत में सोचा करता था कि ऐसा क्यों होता है। इनका उत्तर देने वाला कोई भी था। शारीरिक प्रक्रिया मन के भावों की अनुगामी है। जाति पैसे ही पूरा कर लौट से संबंधित है। धन व्यक्ति को समाज में प्रबल बनाता है। दाह मील दूर समुदाय इसी से प्रेरित है।
किनारे की मछलियां दूर चली गईं। मछलियों का समूह हुआ पश्चिम क जाने किस ओर मुड़ गया। कम्पनी का उत्पादन कम होने लगा ही गणेश की मछलियों की खोज में नावों को दूर-दूर तक भेजा जाने लगा। पर भी वह नावों में दस-दस दिन का पानी और भोजन रखा जाता, तब विशेषकर नावें रवाना होतीं। गणेशन के लिए दुर्गम स्थल को चुना गया सवार थे। था। उस समुद्र स्थल पर हवा के दबाव की अधिकता से बांधकर अक्सर तूफान उठ खड़े होते थे। गणेशन के लिए यह चुनौती चीत्कार थी और कम्पनी के लिए गणेशन पर पूर्ण विश्वास । संध्या बिखर काल की शुभ बेला में चुनौती और विश्वास से भरी गणेशन की नाव को फूलों की सुगंधी, शंख, मृदंग और घंटियों ने विदा दी और विदा दी पार्वती की अधखिली मुस्कान और आंखों से अटपके आंसुओं ने। नाव समुद्र की लहरों में आंखों से ओझल हो गई। सभी भगवान से प्रार्थना करते हुए लौटे।
पार्वती को दस दिन का समय एक लम्बा समय प्रतीत हुआ। इस समय ने उसमें अनेक अंधविश्वासों को जन्म दिया। अपने पति की रक्षा के लिए वह तरह-तरह के पूजा-अनुष्ठान करती। कृष्णन घर के काम-काज निबटाता ।
पञ्च -छह दिनों के बाद नावों का लौटना शुरू हुआ। मेरे सन्न-भिन्न क्षेत्रों में भेजी गईं नावें एक-एक कर अपने लक्ष्य पैक को पूरा कर लौटने लगीं। एक नाव के मल्लाहों ने बताया कि है पंद्रह मील दूर उस क्षेत्र में तूफान आया था, जिस क्षेत्र में गणेशन की नाव भेजी गई थी। वह तूफान इस क्षेत्र से उठता : हुआ पश्चिम की ओर बढ़ गया। यह सूचना सच्ची थी। अवश्य नाही गणेश की नाव उस तूफान में फंसी होगी। निश्चित समय पर भी वह नहीं लौटी। सारा गांव चिंता में डूब गया। यह चिंता विशेषकर उन परिवारों की थी, जिनके सदस्य उस नाव पर सवार थे। गणेशन की नाव का एक नाविक ट्यूब पर अपने को – बांधकर जब किनारे लगा तो उन घरों में हाहाकार और चीत्कार की लहर दौड़ गई। नाव कैसे बिखर गई और कैसे बिखर गए उसके नाविक । इस दर्दनाक घटना का जब उसने बखान किया तो कलेजा मुंह को आ गया। इसमें मुख्य भूमिका गणेशन की रही, जिसने अपनी जान पर खेलकर सभी साथियों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने के उपाय किए और स्वयं नाव के साथ करके तुफान में न जाने किस और गया। इस खबर से पार्वती पर राज गिर पड़ा। सुहाग के बुडियां टूटकर बिखर गई। माथे का सिंदूर पूंछ गया और धीरे-धीरे गांव वालों की नजरों में देवी जैसी पार्वती मतिनी कहलाने लगी। गांव के लोग उसकी छाया से भी दूर मागन लगे। मंदिर की पौढी पर उसका चढ़ना रोक दिया गया। पु गांव में फैली बुराइयों का दायित्व उसके सिर मढ़ दिया गया। क्योंकि उसका पति ही उस दुर्घटनाग्रस्त नाव का नेता था। उसे दुरात्मा कहा गया। पंचायत में फैसला हुआ कि परम्परा के अनुसार उसका मुण्डन कर गांव की शुद्धि की जाए। कुछ लोगों ने शंका व्यक्त की कि यदि उसे गांव से न निकाला गया तो ने शक्बाह हो जाएगा। पार्वती के मुण्डन का तेरहवां दि गांव तबकया गया। वस्तुतः यह फैसला उसके प्रति ईर्ष्या और जातिवाद का प्रतिवाद लिए हुए था। वैधव्य तो बहाना था। अंधविश्वास के अंधकार में डूबा था पूरा गांव ।
पति की मृत्यु की संभावना ने पार्वती को कठोर बना दिया और सभी परम्पराएं तोड़कर पति की मृत्यु का तेरहवां दिनसं उसने गांव से चार मील दूर मंदिर के खंडहर में बिताया। पति की आत्मशुद्धि के लिए उसने पूजा-अनुष्ठान यहीं किए।
इस सामाजिक संस्कार की कृष्णन पर कठोर प्रतिक्रिया हुई। उसने महसूस किया कि इस समाज में मां के वैधव्य से तो मां का मर जाना अच्छा है। मां का दुख वह अंदर-ही अन्दर महसूस कर रहा था। उसने निश्चय किया कि वह अपने पिता की खोज में जाएगा। अगले दिन प्रातः वह उसी कम्पनी में गया और उसने उसके मालिक से प्रार्थना की। मालिक ने उसे छोटा कहकर लौटाया नहीं, बल्कि उसके पिता के परिश्रम और ईमानदारी को याद करके परिवार के सहायतार्थ उसे नौकरी पर रख लिया। घर जाकर उसने यह समाचार अपनी मां को सुनाया। मां ने इसका प्रतिवाद किया- “नहीं बेटा, मैं तुम्हें वहां उसे नहीं जाने दूंगी।”
हे “मां तुम घबराती क्यों हो और भी तो नाविक लौट आए थे। मुझे कुछ नहीं होगा।”
उसने मां के चरण छूकर आशीर्वाद मांगा। पार्वती उसे न भेजने को बिल्कुल तैयार नहीं होती यदि उस मंदिर का बूढ़ा पुजारी उसे भगवान का विश्वास न दिलाता। उसने दिल पर पत्थर रख लिया। यदि कृष्णन भी नहीं लौटा तो वह भी अपने आपको सागर की भक्षिणी लहरों में समर्पित कर देगी।
पार्वती को फिर वही दिन देखने को मिला। समुद्री तूफान ने – संभवतः उस नाव को भी निगल लिया, जिसमें नाविक बन उसका बेटा सवार था। उसकी रही-सही आस भी टूट गई। समाज और संबंध दोनों ने उसे ठुकरा दिया। नारी में जितनी ममता है उतना ही निश्चय भी है।
समुद्र के शान्त होने तक प्रतीक्षा कर, संध्या बेला में भगवान के चरणों में सिर झुकाए पार्वती समुद्र की ओर बढ़ी। उसकी
आंखें डबडबाई जरूर पर मन की बढ़ता ने आंसुओं को परी पर गिरने से रोके रखा। चांद धीरे-धीरे अपना अस्तित्व स्थापित कर रहा था। उसके थके से कदम समुद्र की ठंडी रेत पर तैया के चिन्ह छोड़ते चले जा रहे थे। अब तक अधूरी पार्वती पूरी होते जा रही थी। हृदय की धड़कन मानो पत्थर बन गई हो। समुद्र के किनारे एक चट्टान पर खड़ी होकर, वह समुद्र को निहारने लगी। समुद्र की एक के बाद एक उठती लहर मानो उसके सभी मूक प्रश्नों का उत्तर दे रही हो। उसने भगवान का स्मरण किया। उसके रुके आंसू गालों पर बहकर चट्टान पर आ गिरे। अपने नेत्र बंद कर वह समुद्र की उमड़ती हुई लहरों में आ गिरी। समुद्र की लहरों और एक सती के बीच आत्मिक संघर्ष छिड़ गया। लहरे उसके सतीत्व को जीत नहीं सकीं। अपनी गोद में बिठाकर लोरियां सुनाती हुई समुद्र की इन लहरों ने उसे चूमा और समुद्र के किनारे एक चट्टान पर ला सुलाया। प्रातः सूर्य की किरणों ने जब उसके गाल थपथपाए तो उसकी बेहोशी टूटी। वह आश्चर्य से उठ खडी हुई। इससे भी बड़ा आश्चर्य यह था कि एक टूटी था, उतना नाव में उसका पति और रेत के बिस्तरे पर उसका बेटा मानों पर थे. पर र उसके समीप सो रहे हों। एक क्षण के लिए उसे यह सपना प्रतीत में नहीं हुआ। उसने स्थिति को समझा और उठकर उन दोनों का उपचार शुरू किया। आज उसकी जीत ‘सावित्री’ की जीत से भी बड़ी थी। उनके होश में आते ही उसके मुख से निकल पड़ा। भाभी का ‘विधाता इतना निष्ठुर नही, जितना निष्ठुर यह समाज है।

