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प्रेरक प्रसंग अध्याय 25:- मातृभाषा के प्रति प्रेम

घटना उस वक्त कि है, जब भारत परतंत्र था तथा उस वक्त अंग्रेजों का शासन था | लन्दन के एक छात्रावास में एक भारतीय विद्यार्थी को दिनदर्शिका में कुछ लिखते देख उसके एक आंग्ल सहपाठी ने पूछा,’’यह क्या लिख रहे हो ?’’
‘’दिनदर्शिका, ‘’उस विधार्थी ने उत्तर दिया |
‘’दिनदर्शिका ? और वह भी अंग्रेजी में ?
‘’इसमें कौन-सी ताज्जुब की बात हुई ? अंग्रेजी जो पढ़ रहा हूँ |’’
‘’मेरे मित्र, दिनदर्शिका में हम अपना ह्रदय ऊँडेल देते हैं | हमारा दिल खोलने के लिए दिनदर्शिका के आलावा अन्य कोई साधन नहीं और हम अपना दिल अपनी मातृभाषा में ही खोल सकते हैं, न कि किसी विदेशी भाषा में | फिर हिंदी तो हमारी राष्ट्रभाषा है ! हम तुम पर राज कर रहे हैं, इसका यह अर्थ नहीं कि तुम अपनी भाषा छोड़कर हर चीज हमारी भाषा में लिखा करो |’’
बात उस विद्यार्थी को जँच गयी और उसने निश्चय किया कि अब वह न केवल दिनदर्शिका ही हिंदी में लिखा करेगा , वरन यर्थासंभव हिंदी का ही प्रयोग करता रहेगा |
वह विद्यार्थी थे महाराष्ट्र के भूतपूर्व राज्यपाल स्व. श्रीप्रकाश |