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षटतिला एकादशी में तिल का विशेष महत्त्व रहता है

षटतिला एकादशी माघ महीने में आता है. इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य को मृत्यु के बाद मोक्ष प्राप्त होता है. साथ ही स्वर्ग में समस्त सुखों की प्राप्ति होती है. षटतिला एकादशी का व्रत 6 फरवरी को रखा जाएगा. इस दिन भगवान विष्णु की उपासना की जाती है. षटतिला एकादशी माघ मास की सबसे खास एकादशी मानी जाती है. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा में तिल का भोग लगाया जाता है |

ज्योतिष के अनुसार, षटतिला एकादशी पर तिल का बेहद खास महत्व है. इस व्रत में तिल से स्नान, तिल का उबटन लगाना, तिल से हवन, तिल से तर्पण, तिलों का दान और तिलों से बनी चीजों का सेवन करना अत्यंत शुभ माना गया है.

षटतिला एकादशी पूजन विधि –

प्रात:काल स्नान के बाद भगवान विष्णु की पूजा करें और उन्हें पुष्प, धूप आदि अर्पित करें. इस दिन व्रत रखने के बाद रात को भगवान विष्णु की आराधना करें, साथ ही रात्रि में जागरण और हवन करें. इसके बाद द्वादशी के दिन प्रात:काल उठकर स्नान के बाद भगवान विष्णु को भोग लगाएं और पंडितों को भोजन कराने के बाद स्वयं अन्न ग्रहण करें.

षटतिला एकादशी उपाय –

  1. षटतिला एकादशी के दिन पूजन में तिल से हवनकरें औरइस दिन भगवान विष्णु की पूजा करते समय वासुदेवाय नम: मंत्र का जाप करें.
  2. इसके अलावा षटतिला एकादशी के दिन तिल से तर्पण करने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है. इस दिन तिल से से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है. इस दिन तिल से तर्पण करने से पितर प्रसन्न होते हैं और परिवार को धन समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं.

षटतिला एकादशी व्रत के 5 महत्व-

  1. षटतिला एकादशी का व्रत करने से सभी पापों से मुक्ति मिलती है.
  2. भगवान विष्णु की कृपा पाने से व्यक्ति को जीवन के अंत में वैकुंठ में स्थान प्राप्त होता है.
  3. षटतिला एकादशी के दिन पानी में तिल डालकर स्नान करने से सेहत अच्छी रहती है.
  4. माघ माह में जो भी व्यक्ति गंगा स्नान या संगम स्नान करता है,उसे सहज ही भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त हो जाती है.
  5. षटतिला एकादशी पर जो व्यक्ति जितना तिल दान करता है,उतने ही वर्ष स्वर्ग में रहने का सौभाग्य प्राप्त होता है.

षटतिला एकादशी की व्रत कथा –

चिरकाल में एक बार नारद जी ने भगवान श्रीहरि विष्णु जी से षटतिला एकादशी व्रत की महिमा और कथा जानने की इच्छा जताई। उस समय विष्णु जी ने कहा-हे महर्षि! एक समय की बात है। पृथ्वी लोक पर एक ब्राह्मणी नित्य-प्रतिदिन मेरी पूजा-आराधना करती थी। वह सभी नियमों का पालन करती थी। उस ब्राह्मणी की भक्ति से मैं बहुत प्रसन्न था। एक बार ब्राह्मणी ने एक महीने तक लगातार मेरी कठिन भक्ति की। इस दौरान ब्राह्मणी ने पूजा, जप और तप किया, लेकिन दान नहीं किया। कठिन भक्ति की वजह से वह दुर्बल हो गई।

उस समय मैंने सोचा-कठिन भक्ति से ब्राह्मणी ने वैकुण्ठ लोक तो प्राप्त कर ली है, लेकिन दान न देने की वजह से विष्णुलोक में तृप्ति नहीं मिलेगी। यह जान मैं साधु रूप धारण कर उसके पास भिक्षा मांगने गया। उस समय ब्राह्मणी ने मुझे दान में मिटटी का एक पिंड दिया। कुछ दिनों के बाद ब्राह्मणी की मृत्यु हो गई। जब वह वैकुंठ पहुंची, तो उसे एक कुटिया मिला, लेकिन कुटिया में कुछ भी नहीं था।

यह देख ब्राह्मणी बोली-हे प्रभु! मैंने आपकी इतनी भक्ति की और वैकुंठ में केवल कुटिया दिया गया। तब मैंने उस ब्राह्मणी से कहा-हे देवी! आपने पूजा, भक्ति तो की, लेकिन किसी को दान नहीं दिया। अतः आपको वैकुंठ में केवल कुटिया मिला। उस समय ब्राह्मणी ने उपाय जानना चाहा। यह सुन भगवान विष्णु बोले-जब देव कन्याएं आएं, तो उनसे षटतिला एकादशी व्रत करने की विधि पूछना। कालांतर में ब्राह्मणी ने षटतिला एकादशी व्रत किया। इस व्रत के पुण्य-प्रताप से ब्राह्मणी को वैकुंठ में सभी चीजों की प्राप्ति हुई। यह सुन नारद जी-आपकी लीला अपरंपार है, प्रभु! नारायण, नारायण!